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Sunday Homilies - August 25, 2013
वर्ष का इक्कीसवाँ इतवार
By फादर सुमन तिर्की

होशेाआ 24:1-2, 21-22;  एफे़सियों 5:21-32; योहन 6:60-69

मिलनाडु राज्य के हिन्दु परिवार में जन्मे बालक ने यह कभी सोचा नहीं होगा कि वह ख्रीस्त भक्त बनकर एक दिन समाज की सेवा करेगा।  कॉलेज की पढ़ाई के दरमियान उसे पवित्र बाइबिल के नये विधान की एक प्रति हाथ लग गई।  जैसे-जैसे वह हर पन्ने से परिचित होता गया, उसे लगा कि अब उसने जीवन की पूँजी को पा लिया है।  इस अनन्त जीवन के श्रोत को पाने के लिए अब वह अपना पूरा जीवन ही दाँव पर लगा देता है।  बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए उसे आठ वर्षों तक परिवार एवं समाज के विरोध का सामना करना पड़ा।  इसके बाद पुनः सेमिनरी प्रवेष के लिए आठ वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।  ये सोलह वर्षों तक की लड़ाई, कठिनाईयाँ और अड़चन उसके उत्साह को कम नहीं कर पायी।  उसने सेमीनरी में प्रवेष कर आठ वर्षों तक सफलतापूर्वक अध्ययन किया और ईशवचन को गहराई से समझने का प्रयास किया।  आज वे एक पुरोहित बनकर तामिलनाडु के ही एक धर्मप्रांत की सेवा कर अनंत जीवन देने वाले प्रभु वचन को लोगों के बीच फैला रहे हैं। 

आज हमारे बीच ऐसे कई व्यक्ति होंगे जो ईष-वचन को आत्मसात करने के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानी दे चुके हैं।  कितने लोग इसे पाने के लिए विभिन्न प्रकार के दुःख-कष्ट झेल चुके हैं और झेल रहे हैं।

संत योहन रचित सुसमाचार में हमने सुना कि येसु की कठोर शिक्षा को सुनकर लोग उनसे मुख मोड़ लेते हैं।  वे भूल जाते हैं कि मंजिल पाने के लिए एक मुसाफिर को कँटीली राहों, ऊँचे-नीचे पहाड़ों, नदी-नालों और कई मुसीबतों से होकर गुजरना पड़ता है।  आखिर येसु की कौन सी ऐसी शिक्षा है जिसके कारण लोग उनसे दूर भागने लगते हैं।  येसु ने कहा, ’’यदि तुम मानव पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका रक्त नहीं पियोगे तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा।’’ (योहन 6:53)  येसु के ये वाक्य लोगों को आष्र्चयचकित करने वाले थे।  वे सोचने को मज़बूर थे कि यह कैसे अपने शरीर और रक्त को हमें देंगे।  हम कैसे उनका मांस खायेंगे और रक्त पियेंगे। 

येसु ने ब्यारी के कमरे में पवित्र यूखारिस्त संस्कार की स्थापना की।  उन्होंने अपने आप को रोटी और दाखरस के रूप में चेलों को दिया।  येसु तो चाहते थे कि चेले उनके मांस और रक्त से पोषित होकर नवजीवन एवं अनंत सुख के हकदार बनें।  इन्ही वाक्यों को येसु बारम्बार हमारे लिए भी पवित्र मिस्सा में दुहराते हैं।  येसु के वाक्य-जो मेरा मांस नहीं खाता और मेरा रक्त नहीं पीता, उसमें जीवन नहीं, हमें भी चुनौती देता है।  वास्तविकता यह है कि लोगों के बीच आज पवित्र बलिदान में भाग लेने एवं प्रभु को योग्य रीति से ग्रहण करने की रुचि घटती जा रही है।  इसका दुष्परिणाम साफ देखा जा सकता है।  लोगों के बीच नैतिकता विलुप्त होती जा रही है।  आज का मानव नवजीवन के बदले पतन को चुन रहा है।  एक जर्मन कहावत है, ’’मैं जिसकी रोटी खाता हूँ उसी का गुण गाता हूँ’’  परन्तु आज तो हम प्रभु को अपने दिल में ग्रहण करने से ही मुकर जाते हैं तो उसकी महिमा कहाँ गायेंगे।  संत अम्ब्रोस कहते हैं, ’’ख्रीस्त मेरा भोजन है, ख्रीस्त मेरा पेय है, प्रभु का मांस मेरा भोजन है, प्रभु का रक्त मेरा पेय है, ख्रीस्त ही मेरा सबकुछ है।’’  क्या हम संत अम्ब्रोस के इस वाक्य में हाँ में हाँ मिलाते हैं?  शायद नहीं के बराबर।

जब येसु ने देखा कि लोग उनकी शिक्षा सुनकर दूर भाग रहे हैं तब उन्होंने अपने चेलों से पूछा, ’’क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?’’  सिमोन उत्तर देता है, ’’हम किसके पास जायें , आपके ही शब्दों में अनंत जीवन का सदेंश है’’  शायद लोगों को अपना पुराना जीवन ही अधिक भाया होगा।  अनैतिकता का जीवन, पापमय जीवन, रंग-रंगरैलियों और लड़ाई-झगडे़ का जीवन जिसे वे वर्षों से जीते आ रहे थे।  उन्हें शांति, एकता, प्रेम, ज्योति एवं अमन चैन का जीवन पसंद नहीं था।  तभी तो वे प्रभु से दूर चले गये।  दूसरी ओर चेलों ने प्रभु के वचन में अनंत जीवन पाया।  प्रभु के वचन में उन्होंने नवजीवन का दिया देखा।  यही कारण था कि वे अनंत जीवन देने वाले प्रभु के वचन के लिए सबकुछ त्यागने, दुःख-कठिनाई झेलने और उसका अनुसरण करने को तैयार थे।

प्रथम पाठ भी आज के सुसमाचार से मिलता-जुलता है।  योशुआ इस्राएली जनता से पूछते हैं कि वे किस की आराधना करना चाहते हैं?  किसे अपने जीवन में जगह देना चाहते हैं? उस ईश्वर को ईश्वर को जिन्होंने उन्हें फिराउन की गुलामी से छुड़ाकर नया जीवन प्रदान किया अथवा किसी दूसरे देवी-देवता को?  वे स्पष्ट उत्तर देते हैं कि वे प्रभु ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य देवी-देवताओं की पूजा नहीं करेंगे।  उन्हें पूरा यकीन था कि प्रभु ने ही उन्हें नयी जिन्दगी दी है।  उन्हें मालूम था कि उनके पूर्वज भी उसी प्रभु की पूजा अर्चना करते आये थे। 

संत पौलुस एफे़सियों के पत्र में एक आदर्श परिवार के बारे में हमें अवगत कराते हैं।  वे कहते हैं पति-पत्नी एक दूसरे को प्यार करें।  उनका कहना है कि पति-पत्नी को उस प्रकार प्यार करें जिस प्रकार प्रभु ने कलीसिया को प्यार किया तथा अपने जीवन को उसके लिए अर्पित किया।  संत पौलुस पत्नियों से यह आषा रखते है कि वे अपने पतियों के अधीन रहें।  जिस प्रकार कलीसिया प्रभु के अधीन रहती है।  शादी के समय स्त्री-पुरूष एक दूसरे को प्यार करने, जीवन साथ निभाने, दुःख-सुख बाँटने, हर परिस्थति में एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की प्रतिज्ञा करते हैं।  एक सुन्दर परिवार के निर्माण के लिए ये कितने प्रभावकारी वचन है!  शादी के बाद पुरुष-स्त्री दो नहीं बल्कि एक बन जाते हैं।  वे एक नयी जिन्दगी की शुरूआत करते हैं।  एक दूसरे के लिए वे नया जीवन देते हैं।  परन्तु आज चिंता का विषय है कि इतनी सुन्दर प्रतिज्ञा के बावजूद कितने परिवार टूट जाते हैं और कितने टूटने की कगार पर पहुँच चुके हैं।  इसका मुख्य कारण प्रभु के वचन पर ध्यान न देना और उन्हें अपने जीवन में अम्ल में न लाना है।

यदि आज हम प्रभु वचन के अनुसार जीवनयापन करना चाहते हैं, प्रभु के प्रेम, शांति, ज्योति एवं कृपा को पाना चाहते हैं, तो हमें प्रेरितों को भाँति त्याग और तपस्या का जीवन जीना होगा।  कठिनाई भरी राहों से गुजरना होगा।  प्रभु येसु हमारे जीवन की ज्योति हैं, हमारे जीवन की रोटी है, हमारे जीवन का मार्ग है।  वे निरन्तर हमें अपने जीवनदायी वचनों और शरीर तथा लहू से पोषित करना चाहते हैं।  जिससे की हम उनके पद्चिन्हों पर चल सकें।

अनंत सुख और नवजीवन प्राप्त करने के लिए आज ज़रूरत है कि हम कुछ आवष्यक गुणों को अपने जीवन में अपनाये।

प्रभु कहते हैं जो अपना सब कुछ त्याग नहीं देता और अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे नहीं हो लेता, वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता।  यह बात ईश्वरीय सुख पाने के लिए भी लागू होता है।

एक नयी जिन्दगी जीने के लिए हमें प्रेम की राह चलना होगा।  एक दूसरे को प्यार करना और हर जगह प्यार का बीज़ बोना होगा।  प्रभु की शिक्षा है- तुम एक दूसरे को प्यार करो जैसे मैंने तुम्हें प्यार किया है। 

हर इंसान को एक खुषहाल एवं सुखी जीवन की तमन्ना होती है।  इसलिए जो गरीब है, जिन्हें हमारी मदद की ज़रूरत है, हम उन लोगों तक अपना हाथ बढ़ाये।  याद रहे कि हमारे न्याय के दिन ईश्वर हमारे कर्मों के आधार पर ही हमारा न्याय करेंगे।

हम प्रभु से प्रार्थना करें कि वे अपने जीवनदायी कृपा से हमें भर दे जिससे कि हम नवजीवन प्रदान करने वाले प्रभु वचन के लिए तरसते रहें और हम भी उनकी आशिष पाकर कह सकेंगे, ’’हम किसके पास जायें, आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है।’’

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