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Sunday Homilies - October 06, 2013
वर्ष का सत्ताइसवाँ इतवार
By फादर षाजि स्टनिस्लाउस

उत्पत्ति 2:18:24; इब्रानियों 2:9-11; मारकुस 10:2-16

आज का सुसमाचार विवाह की पवित्रता और उसके स्थायी बंधन पर येसु ने जो शिक्षा दी, उस पर प्रकाश डालता है।  फरीसियों ने येसु की परीक्षा लेने, उन्हें अपने जाल में फंसाकर हेरोद के विरुद्ध कुछ कहलवाने तथा मूसा के नियमों का उल्लंघन कराने की कोशिश की।  मूसा द्वारा दिये गये विवाह संबधी अपवादों की ओर इंगित करते हुए उन्होनें येसु से पूछा, ’’क्या अपनी पत्नी का परित्याग करना पुरूष के लिए उचित है?’’  अपने उत्तर के द्वारा येसु मनुष्य द्वारा बनाये नियमों को नकारते हैं।  मूसा ने इस्राएलियों को त्यागपत्र लिखकर पत्नी को त्यागने की अनुमति दी थी।  प्रभु येसु कहते हैं कि मूसा ने लोगों के हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा है।  येसु यह भी कहते हैं कि ईश्वर ने प्रारंभ में विवाह के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किये थे उसी पर हमें ध्यान देना चाहिए।  जिसके अनुसार विवाह बंधन में एक पति एवं पत्नी एक शरीर हो जाते हैं और किसी को ईश्वर द्वारा जोड़े गये पति-पत्नी को अलग करने का अधिकार नहीं है। 

प्रारंभिक स्थिति के बारे में हम आज के पहले पाठ में सुनते हैं।  ईश्वर यह महसूस कर की अकेलापन मनुष्य के असंतोश का कारण बन सकता है उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाने की चेष्ठा करते हैं।  वे मिट्टी से पशुओं तथा पक्षियों को एक-एक करके गढ़ते हैं।  हाँलाकि मनुष्य हर पशु-पक्षी को नाम तो देता है, उनमें से किसी को भी अपना उपयुक्त सहयोगी नहीं मानता।  फिर ईश्वर मनुष्य को गहरी नींद में सुलाकर उसकी एक पसली निकालकर उससे एक स्त्री को गढ़ते हैं तथा उसे मनुष्य के सामने प्रस्तुत करते हैं।  तब मनुष्य बोल उठता है, ’’यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस।  इसका नाम नारीहोगा क्योंकि यह तो नर से निकाली गयी है’’ 

उत्पत्ति ग्रंथ का उल्लेख करते हुए प्रभु फरीसियों को यह बताना चाहते हैं कि पत्नी पति के लिए एक सहयोगी है तथा पति को चाहिए कि अपनी पत्नी को अपने ही अस्तित्व का भाग मानकर अपने समान प्यार करे क्योंकि वे दो नहीं बल्कि एक हैं।  इस कथन के द्वारा प्रभु पति-पत्नी को बराबरी प्रदान करते हैं।  उन्हें एक दूसरे का आदर करना, एक-दूसरे की सेवा करना, एक-दूसरे को प्यार करना चाहिए।  प्रभु के अनुसार विवाह के द्वारा एक चिरस्थायी बंधन स्थापित होता है।

आज की दुनिया में जब लोग गिनना-तौलना पंसद करते हैं आपसी व्यवहार में भी एक प्रकार की व्यवसायिक मानसिकता को अपनाते हैं।  वे स्वार्थता से प्रेरित होकर वैवाहिक जीवन में भी अपने लाभ तथा क्षणिक खुशी के लिए एक-दूसरे को वस्तु मात्र समझने लगते हैं।  प्रभु इस मानसिकता की आलोचना करते हैं। 

उत्पत्ति ग्रंथ अध्याय एक में ही विवाह के लक्ष्य को दर्षाने वाला एक और प्रसंग है।  वाक्य 28 हमें यह बताता है कि ईश्वर ने मनुष्य की सृष्टि करने के बाद उन्हें फलने-फूलने, पृथ्वी पर फैल जाने और उसे अधीन करने का आशीर्वाद दिया।  इस प्रकार अपनी संतानों द्वारा मनुष्य पृथ्वी पर फैल जाते हैं।  जब हम दोंनो प्रसंगो को एक साथ देखते हैं तब हमें यह ज्ञात होता है कि पति-पत्नी को आपस में कुछ जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती है।  साथ ही उन्हें मिलकर अपने संतानों के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती है।  उन्हें चाहिए कि वे एक-दूसरे को प्यार करे तथा बच्चों की अच्छी देखरेख करे।  बच्चों को अपने जीवन के लिए बोझ या असुविधा मानकर संतानोंत्पत्ति का नकारना ख्रीस्तीय मूल्यों के खिलाफ है।  इसी प्रकार बच्चों को पैदा करने के बाद उनकी देखरेख न करना भी ख्रीस्तीय मूल्यों के खिलाफ है।  इस प्रकार बच्चे पति-पत्नी के बीच एकता कड़ी बन जाते हैं। 

परिवार घरेलू कलीसिया माना जाता है।  विवाह के द्वारा यह कलीसिया जन्म लेती है।  एफ़ेसियों को लिखते हुए संत पौलुस पति-पत्नियों को यह आदेश देते हैं कि वे प्रभु येसु ख्रीस्त और कलीसिया के उदाहरण को अपनाये।  जिस प्रकार कलीसिया प्रभु के अधीन रहती है उसी प्रकार पत्नी को पति के अधीन रहना चाहिए।  इसका अर्थ यह नहीं निकालना चाहिए कि पति आदेश देते रहें और पत्नी उसका पालन करती जाये।  क्योंकि संत पौलुस खुद कहते हैं कि पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी को ठीक उस प्रकार प्यार करे जिस प्रकार प्रभु येसु ने कलीसिया के प्रति अपने प्यार के खातिर अपने जीवन को भी न्यौछावर कर दिया। 

यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि प्रभु कहते है कि जिस ईश्वर ने जोड़ा है उसे कोई अलग न करे।  विवाह संस्कार में विभिन्न परिस्थति तथा वातावरण में बढ़ने वाले दो व्यक्तियों को ईश्वर ही जोड़ते हैं।  कलीसिया के सामने जब एक स्त्री और पुरुष एक दूसरे को स्वीकार करते हैं तो कलीसिया इस रिश्ते पर मुहर लगाते हुए समाज को यह बताती है कि इस स्त्री और पुरुष को ईश्वर ही अब जोड़ रहे हैं और अब से किसी का इन्हें अलग करने का अधिकार नहीं है।  अगर पति-पत्नी इस सच्चाई को ठीक से समझेंगे तो आपस में मन-मुटाव तथा मानसिक अलगाव के समय वे मिलकर ईश्वर से ही विनय करेंगे कि उनके संबंध को फिर से मज़बूत बनाये।

जब दंपत्ति अपने वैवाहिक जीवन में कई कठिनाईयों का सामना करते हैं तो उन्हें ईश्वर की सहायता खोजनी चाहिये । प्रार्थना के द्वारा ही वे मदद के लिए ईश्वर के पास पहुंच सकते हैं। तथा उनकी सामान्य रूचियां, दिन-प्रतिदिन का जीवन उनकी आवश्यकतायें एवं मांगें ईश्वर को चढ़ा सकते हैं । प्रार्थना उन्हें पे्रम एवं एकता में बांधे रखती है। प्रार्थना ही उन्हें उनकी कठिनाईयों में बल प्रदान करती है। तथा एक दूसरे के प्रति वचनबद्ध और ईमानदार रहने के लिए सहायता प्रदान करती है। आज जब हम सभी मिलकर इस युखारिस्त को मना रहे हैं । तो आईये, यहां उपस्थित सभी दंपत्तियों को, ईश्वर को चढ़ायें ताकि वे पवित्र आत्मा से पे्ररित होकर परिवार के सभी सदस्यों से जुड़े रहे ईश्वर उन्हें ईश्वरीय इच्छा तथा एक दूसरे के प्रति ईमानदार बनने में सक्षम बनायें।

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