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Sunday Homilies - December 08, 2013
आगमन का दूसरा इतवार
By फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल

स्तोत्र 130:3-4 में स्तोत्रकार ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि ईश्वर यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा। लेकिन तू हमारे पापों को क्षमा करता है इसलिए हम तुझ पर श्रद्धा रखते हैं।’’ बाइबिल में शुरु से लेकर अन्त तक हम ईश्वर के प्रेम और मनुष्यों के पाप का वर्णन देख सकते हैं। बाइबिल में एक तरफ हम एक ऐसे ईश्वर को देख सकते हैं जो मनुष्यों को हमेशा प्यार करते हैं। लेकिन दूसरी ओर हम ऐसी मानवजाति को देखते हैं जो हमेशा पाप करते हुए इस प्रेममय ईश्वर को दुःख पहुँचाती है। बाइबिल हम से एक ऐसे ईश्वर के बारे में कहती है जो एक प्रेममय पिता की तरह अपने खोये हुए बेटे की वापसी के लिए इन्तजार करते हैं। लेकिन दूसरी ओर हम ऐसी जनता को देखते हैं जो अपने पापों को छोड़कर इस प्रेममय ईश्वर की ओर आने की कोशिश नहीं करती है। एक तरफ हम एक ऐसे ईश्वर को देखते हैं जो एक भले गडे़रिये की तरह सब कुछ छोड़कर अपने खोये हुए भेड़ों को ढूँढने के लिए निकलते हैं लेकिन दूसरी ओर हम एक ऐसी जनता को देख सकते हैं जो इस प्रेममय पिता से दूर चली जाती है। एक तरफ हम उस ईश्वर को पाते हैं जो एक माँ की तरह अपने बच्चों को प्यार करते हैं लेकिन दूसरी ओर हम उन लोगों को पाते हैं जो ईश्वर के प्रेम को भूल जाते हैं।

यह तो सच है कि बाइबिल हमें स्पष्ट रूप से मानव जाति के पापों के बारे मे समझाती है। लेकिन मनुष्य के पापों से ज्यादा बाइबिल हमें उस ईश्वर के बारे में बताती है जो मनुष्यों को पापी होने पर भी प्यार करते हैं। पाप करते हुए उन से दूर जाने के बावजूद भी ईश्वर उनकी वापसी के लिए इंतजार करते हैं। वे पापी मनुष्य से इतना ही चाहते हैं कि वह अपने पापों के लिए पश्वात्ताप करें। ईश्वर यह नहीं चाहते कि कोई मनुष्य पाप के कारण नष्ट हो जाये बल्कि वह अपने पापों के प्रति पश्चात्ताप करके मुक्ति प्राप्त करे।

बाइबिल में हम बहुत से सन्तों या महान व्यक्तियों को देख सकते हैं जैसे संत पौलुस, संत पेत्रुस, राजा दाऊद इत्यादि। ये सब के सब महान व्यक्ति थे। लेकिन यदि हम इनके जीवन में देखें तो हमें मालूम होगा कि उनके जीवन में भी ऐसा समय था जब वे भी पाप के चंगुलों में फँस गये थे या जब उन्होंने भी ईश्वर को भूलकर, उनके प्रेम को भूलकर उनके विरुद्ध अपराध किये थे। फिर भी हम देख सकते हैं कि जब वे अपने पापों के प्रति पष्चात्ताप करते हैं तो ईश्वर उनके पापों को क्षमा करते हैं और उन्हें महान बनाते हैं। संत पेत्रुस ने तीन बार प्रभु येसु को अस्वीकार किया था। फिर भी जब उन्होंने अपने पापों के प्रति पष्चात्ताप किया तो ईश्वर ने उनके अपराध क्षमा किये और उन्हें प्रेरितों का नेता नियुक्त किया। राजा दाऊद ने उरिया की पत्नी के साथ व्यभिचार किया था और उरिया को मरवाया था। फिर भी जब राजा ने अपने पापों के प्रति पश्चात्ताप किया तब ईश्वर ने उन्हें क्षमा प्रदान की और आज वह इस्राएल के सबसे महान राजा के रूप में याद किये जाते हैं।

आज के सुसमाचार में हमने सुना कि योहन बपतिस्ता पश्वात्ताप करने एवं जीवन में पश्चात्ताप का उचित फल उत्पन्न करने को कहते हैं। योहन बपतिस्ता अपना उपदेश यह कहकर शुरु करते हैं, “पश्वात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है” (मत्ती 3:2)। अध्याय 4 में हम देख सकते हैं कि प्रभु येसु भी अपना पहला सम्बोधन इन्हीं शब्दों से प्रारंभ करते हैं पश्वात्ताप करों स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है” (मत्ती 4:17)। प्रेरित-चरित, अध्याय 2 में संत पेत्रुस भी अपने पहले भाषण में लोगों से कहते हैं, “आप लोग अपने पापों की क्षमा के लिए पश्चात्ताप करो” (प्रेरित-चरित 2:38)। खीस्तीय धर्म में पापों के पश्वात्ताप पर क्यों इतना जोर दिया जाता है? यह इसलिए है कि मानव में ऐसा कोई भी नहीं है जो पाप नहीं करता हो। संत योहन अपने पहले पत्र में कहते हैं, “यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं तो हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं। हम सब पाप करते हैं और हमारा हर एक पाप हमें स्वर्गराज्य से दूर ले जाता है। केवल सही पश्वात्ताप ही एक ऐसा रास्ता है जिसके द्वारा हम स्वर्ग राज्य में प्रवेश कर सकते हैं।

हम सब प्रभु येसु के जन्म का त्योहार मनाने के लिए अपने आपको तैयार कर रहे हैं। आज के सुसमाचार द्वारा ईश्वर का वचन हमसे यही आग्रह करता है कि हम पश्वात्ताप करते हुए ईश्वर के पास लौट आयें। आइए, हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि हमारे दुर्गुणों को छोड़कर पश्वात्ताप करते हुए ईश्वर के पास लौट आने की कृपा ईश्वर हमें प्रदान करें ताकि हम शुद्ध एवं पवित्र दिल से बालक येसु को स्वागत कर सकें।
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