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Sunday Homilies - December 15, 2013
आगमन का तीसरा इतवार
By फादर फ्रांसिस स्करिया

आज के दिन को हम आनन्द का इतवार कह सकते हैं। नबी इसायाह आज के पहले पाठ में कहते हैं, ’’मरुस्थल और निर्जल प्रदेश आनन्द मनायें। उजाड़ भूमि हर्षित होकर फले-फूले, वह कुमुदिनी की तरह खिल उठे, वह उल्लास और आनन्द के गीत गाये।’’ इसके कारण भी नबी हमारे सामने रखते हैं, ’’देखो, तुम्हारा ईष्वर आ रहा है। . . . वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है।’’

जिस आनन्द का नबी ज़िक्र करते हैं, वह कोई सांसारिक खुशी नहीं है जिसे हम धन-सम्पत्ति से या नाम-काम से कमा सकते हैं। वह अनंत आनन्द है जिसे ईष्वर ही दे सकते हैं। इस आनन्द को हम कमा नहीं सकते हैं, परन्तु यह हमें दिया जाता है और देने वाले स्वयं ईष्वर हैं।

से और अधिक गहराई से समझने के लिये हम आज के सुसमाचार को ध्यानपूर्वक देखें। एक मिनिट संत योहन बपतिस्ता के बारे में सोचिए। सच्चाई और ईष्वर की इच्छा को प्रकट करने के कारण उन्हें राजा हेरोद ने जेल में डाल दिया। योहन को शायद शक था कि क्या उनका कार्य पूरा हुआ है या नहीं। लेकिन अपने काम को आगे बढ़ाना अब असंभव-सा दिख रहा था। उन्हें यह भी मालूम था कि जल्दी ही राजा हेरोद उन्हें मरवा डालेगा। योहन बपतिस्ता का काम था कि मसीह के लिये रास्ता तैयार करें। लेकिन योहन को यह भी बराबर मालूम नहीं था कि प्रभु येसु मसीह हैं या नहीं।

ऐसी परिस्थिति में वे अपने शिष्यों को प्रभु येसु के पास यह पूछने भेजते हैं, ’’क्या आप वही हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?’’ प्रभु इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देते हैं कि मै मसीह हूँ या नहीं। परन्तु उनसे कहते हैं, ’’जाओ, तुम जो सुनते और देखते हो, उसे योहन को बता दो- अंधे देखते हैं, लँगडे चलते हैं, कोढ़शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है।’’ यह सुनकर योहन के शिष्य चले जाते हैं। वे योहन को क्या बताते हैं या योहन की क्या प्रतिक्रिया होती है, इन सब के बारे में सुसमाचार कुछ नहीं कहता।

लेकिन हम ज़रूर इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि संत योहन की प्रतिक्रिया किस प्रकार की रही होगी! शिष्यों ने उनको बताया कि प्रभु येसु रोगियों को चंगा कर रहे हैं, मुर्दों को जिला रहे हैं तथा गरीबों को सुसमाचार सुना रहे हैं तो अवष्य ही संत योहन बपतिस्ता आनंदित हो उठे होंगे। नबी इसायाह जिस आनन्द का जिक्र आज के पहले पाठ में करते हैं उसी आनन्द का अनुभव संत योहन बपतिस्ता ने इस अवसर पर किया होगा। यह आनन्द अपने कुछ कार्यों से नहीं बल्कि ईष्वर से उन्हें मिलता है। संत योहन बपतिस्ता यह भली भाँति जानते थे कि नबी इसायाह के ग्रन्थ, अध्याय 61 वाक्य 1 और 2 में आनेवाले मसीह के बारे में भविष्यवाणी की गई थी कि वे दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने, दुखियों को ढारस बँधाने तथा बन्दियों को छुटकारे का और कैदियों को मुक्ति का सन्देश सुनाने हेतु अभिषिक्त हैं।

इस अवसर पर हम इसपर भी ध्या दे कि प्रभु येसु अपनी पहचान किस प्रकार शिष्यों के ज़रिये योहन बपतिस्ता के लिये व्यक्त करते हैं। वे अपने नाम या काम का विवरण नहीं देते। वे इतना ही कहते हैं कि तुम लोग जाकर योहन को ये सब बता दो जो तुम देख रहे हो। मसीह की पहचान यूसुफ का पुत्र’, ’मरियम का बेटा,’ ’बढ़ई का पुत्र’, ’येसु नाज़रीआदि नाम-उपनामों से नहीं होती बल्कि ईष्वर की इच्छा पूरी करने से होती है। इसलिये संत योहन बपतिस्ता येसु के द्वारा किये हुए कार्यों को देखते हुये यह अवष्य समझ जाते हैं कि वे ही मसीह हैं।

यह शिक्षा हमारे लिये भी लागू है। हम खीस्तीय या ईसाई कहलाते तो हैं और कई बार हम सोचते हैं कि इतवार के दिन मिस्सा बलिदान में भाग लेने या चर्च को चंदा देने या क्रिसमस जैसे त्योहारों को धूमधाम से मनाने से लोग हमको ईसाई मानेंगे। परन्तु लोगों के बीच ईसाई कहलाना ही काफी नहीं है। अगर हम प्रभु के सामने सच्चे खीस्तीय विष्वासी पाये जाना चाहते हैं तो हमें न सिर्फ अपनी बातों से बल्कि उससे कहीं अधिक अपने आचरण या व्यवहार से यह प्रकट करना पड़ेगा कि हम ईश राज्य की स्थापना में जुटे हैं और हमारे कार्यकलाप इस सच्चाई को दर्षाते हैं। अगर हम ऐसा करेंगे तो जिस प्रकार प्रभु ने योहन की सराहना की उसी प्रकार प्रभु हमारी भी सराहना ज़रूर करेंगे। इस प्रकार के जीवन से हमें अनंत आनन्द प्राप्त होगा और आनन्द मनाने का जो आह्वान नबी इसायाह आज के पहले पाठ में देते हैं उसे हम भी अपना सकेंगे।

सच्चा आनन्द ईष्वर का दिया हुआ वरदान है। परन्तु उसे ग्रहण करने के लिये हमें प्रयत्न करना ज़रूरी है। जब हमारा प्रयत्न और ईष्वर का वरदान आपस में मिलते हैं तब सच्चा आनन्द उत्पन्न होता है। एक बार दो मेंढ़क गलती से दूध की मलाई के बर्तन में गिर पड़े। उनमे से एक मेंढ़क आशावादी था तो दूसरा निराशवादी। निराशावादी मेंढ़क गाढ़ी मलाई को देखकर डर गया और कहने लगा, ’’इससे बच पाना तो मुष्किल है’’ और एक लंबी सास खींचकर मलाई में डूब गया। परन्तु दूसरे आशावादी मेंढ़क ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपने से कहा, ’’मैं भले ही इस मलाई से बाहर न आ सकूँ लेकिन मरने तक तैर तो सकता हूँ।’’ इतना कहकर वह ज़ोर-ज़ोर से गोते लगाने लगा। ऐसा करने से मलाई और अधिक गाढ़ी होती गयी और धीरे-धीरे मक्खन में परिवर्तित हो गयी। इसपर वह मेंढ़क मक्खन के ऊपर चढ़कर एक छलांग में बाहर आ गया। हालाँकिं सच्चा आनन्द ईष्वर की देन है लेकिन उसे अपने जीवन में वास्तविक रूप देना हमारा ही दायित्व है।

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