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Sunday Homilies - January 01, 2014
ईशमाता मरियम का पर्व
By फादर जॉंनी पुल्लोप्पिल्लिल

हर किसी के जीवन में माँ का एक अलग स्थान रहता है।  उनकी ममता एवं वात्सल्य की अलग अनुभूति है जो हमें अपनी माँ के नज़दीक ले आती है।  दूसरों की माँ कितनी ही सुन्दर क्यों न हो, हर व्यक्ति को अपनी ही माँ सर्वश्रेष्ठ लगती है, क्योंकि वह अपने अनुभव के आधार पर अवलोकन करता है।  प्रभु येसु ने भी सांसारिक माँ में उस ममता एवं वात्सल्य का अनुभव किया।  प्रभु को न देखने पर वह माँ तीन दिन तक उनकी खोज मंे लगी रही।

कलीसिया में धन्य कुँवारी मरियम का एक अलग स्थान है।  प्रभु येसु की माँ बनने के कारण हमारे जीवन में भी माँ मरिया का एक अलग स्थान है।  आज सारी कलीसिया माँ मरिया के ईश माता बनने की याद करती है। 

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु के जन्म के बारे में हम सुनते हैं कि किस प्रकार स्वर्गदूत माँ मरिया को संदेश देते हैं और उनके कथनानुसार चरवाहे प्रभु से मुलाकात करते हैं।  इस पूरी घटना में हम विश्वास के अलग-अलग पहलुओं को देखते हैं जिसमें माँ मरियम के पहलू को सबसे उत्तम स्थान प्राप्त है।  इसलिये उन्हें कलीसिया में भी एक महान स्थान प्राप्त हुआ। 

स्वर्ग दूत चरवाहों को दिखाई दिये।  चरवाहे इस्राएली जनता के प्रतीक हैं जिन्होंने ईश पुत्र को देखा, समझा, पर अपनाया नहीं।  यह विश्वास का एक पहलू है।

दूसरे लोग दूत के संदेश से आश्चर्यचकित होते हैं, परन्तु उनका आष्चर्य उन्हें व्यक्तिगत विश्वास की ओर न ले जा कर बाह्य स्तर तक ही सीमित रखता है।  यह उन बीजों के समान है जो पथरीली भूमि में बोये गये, अंकुरित तो वे शीघ्रता से हुए परन्तु जड़ें कमज़ोर होने के कारण शीघ्र ही मुरझा कर नष्ट भी हो गए।

वही स्वर्गदूत माँ मरियम को दर्षन देते हैं।  वे प्रारम्भ से अंत तक ईश वचनों को अपने हृदय में संजोये रखती हैं तथा वचन रूपी बीज को हृदय रूपी भूमि में बो कर आस्था रूपी जल से सींचती हैं।  इसके फलस्वरूप विश्वास रूपी फलप्रदायक वृक्ष तैयार हो गया, ठीक उसी बीज के समान जो उपजाऊ भूमि पर गिरकर अंकुरित होकर सौ प्रतिशत फलदायी बना।  उन्होंने न केवल ईश वचनों को सुना वरन् उन्हें आत्मसात कर उन पर विश्वास किया।  अर्थात् उन्होंने न केवल प्रभु येसु को जन्म दिया बल्कि उनके वचनों पर अटल रह कर जीवन को एक परोपकारी फलदायी वृक्ष बनाया और उनकी इस आस्था और गुण के कारण वे ईश माता तथा विश्वासी आस्थावान बनीं।

इसके द्वारा वे सभी खीस्तीय भाई बहनों के लिए एक चिह्न बनीं।  प्रभु ने कहा, ‘‘मेरी माता और मेरे भाई वे हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं‘‘  तब सर्वथा यह कथन सत्य ही है कि माँ मरियम ईश माता केवल इसलिये नहीं बनी कि उन्होंने प्र्रभु येसु को जन्म दिया वरन् ईश्वर के प्रति उनके अटूट विश्वास और श्रद्धा के कारण भी।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उनके व्यक्तिगत विश्वास ने ही उन्हें मुक्ति के स्रोत प्रभु येसु की माँ बनाया।  हमारे खीस्तीय परिवार में जन्म लेना ही मुक्ति का कारण नहीं बनता, वरन् ईश्वर के प्रति एवं उनके वचनों के प्रति हमारी आस्था और ईश वचनों पर विश्वास ही मुक्ति का साधन बन सकता हैं।  संत पौलुस रोमियों को लिखते हुए कहते हैं कि यहूदियों के लिये खतना तभी लाभदायक हो सकता है जब वे नियमों का पालन करते हैं, वचन पर विश्वास करते हैं, अन्यथा यह निरर्थक रह जायेगा।

संक्षेप में, प्रभु येसु स्वयं ईश्वर थे पर मनुष्य बने।  मनुष्य से इस प्रकार उन्हें एक मानवीय माँ मिली।  वह माँ न केवल एक मनुष्य की माँ बनी बल्कि मुक्ति कार्य के साथ ईश माता स्थापित हुई क्योंकि प्रभु येसु मनुष्य होते हुए भी ईश्वर थे।  आज का यह त्योहार हमें व्यक्तिगत विश्वास, आस्था और श्रद्धा की ओर ले चलता है।  जीवन शैली वचनानुसार होने पर ही हम ईश्वर के कृपा पात्र बन सकते हैं ठीक जैसे माँ मरिया ईश्वरीय कृपा से ईश माता बनी।

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