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Sunday Homilies - January 05, 2014
खीस्त जयंती का दूसरा इतवार
By फादर टॉमी जोसफ

आज का प्रथम पाठ प्रवक्ता ग्रंथ से लिया गया है। प्रवक्ता ग्रंथ बाइबिल की एक ऐसी पुस्तक है जो यहूदी धर्मग्रंथ में नहीं मिलती है। यहूदी बाइबिल की 24 पुस्तकों में प्रवक्ता ग्रंथ को स्थान नहीं मिला है। ईस्वी सन् 1896 में काहिरा शहर में एक गनीज़ा की खोज हुई थी। गनीज़ावह गुप्त संग्रहालय है जिसमें उन पवित्र ग्रंथों का संग्रह है जो वर्तमान में उपयोग में नहीं हैं, पर जिनको ईश नाम के उल्लेख के कारण नष्ट नहीं किया गया है। काहिरा के इस गनीज़ा में अन्य ग्रंथों के साथ-साथ प्रवक्ता ग्रन्थ की हस्तलिखित प्रति भी प्राप्त हुई। इसका अर्थ यह निकलता है कि यहूदी इस पुस्तक को उपयोग में लाते थे। प्रवक्ता ग्रंथ लगभग 180 ई. पू. येरुसालेम में लिखा गया था। प्रवक्ता ग्रंथ में मकाबियों द्वारा विद्रोह के ठीक पहले के समाज के बारे में हमें जानकारी प्राप्त होती है।

आज के पाठ में ‘‘प्रज्ञा‘‘ की प्रशंसा की गयी है। साकार प्रज्ञा कहती है कि मैं प्रारम्भ से ईश्वर के साथ हूँ, ब्रह्मांड की सृष्टि में मेरा हाथ है और मैं अनंतकाल तक रहूँगी। आज इस पाठ को इसलिये चुना गया है कि इस प्रज्ञा का आज के सुसमाचार में उल्लेखित देहधारी शब्द से संबंध है।

संत योहन प्रभु के बारह शिष्यों में सब से कम उम्र के थे और सब की मृत्यु के बाद ही उनका निधन हुआ था। योहन का सुसमाचार एफेसुस में लगभग सन् 100 में लिखा गया था। योहन का सुसमाचार लिखे जाने तक येसु के स्वर्गारोहण को करीब 70 साल हो चुके थे। आदिम कलीसिया के लोगों ने 70 सालों तक प्रभु एवं उनके सुसमाचार पर मनन् चिंतन किया था। खीस्तीय ईश शास्त्र का विकास हो रहा था। तब तक यहूदियों के अलावा यूनानी तथा अन्य भी प्रभु के शिष्य बन चुके थे। कलीसिया में गैर-यहूदियों की संख्या बढ़ चुकी थी। संत योहन ने यूनानी दर्शन शास्त्र को अपनाते हुए सुसमाचार को यूनानियों के लिये भी आकर्षक बनाने की कोशिश की।

आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था, शब्द ईश्वर था। पवित्र ग्रंथ में इस अर्थ से ‘‘शब्द‘‘ संत योहन ही इस्तेमाल करते हैं। सुसमाचार में येसु मसीह ही शब्दहैं जो आदि में विद्यमान थे, हमने उसे अपनी आँखों से देखा है, हमने अपने हाथों से स्पर्श किया है, वह शब्द जीवन है।

हमारे गिरजाघरों और घरों में चरनी बनी है जिसमें बालक येसु की मूर्ति है। लाचार, हर आवश्यकता के लिये अपनी माँ पर निर्भर नन्हा सा बालक हमें बेथलेहेम के बालक की याद दिलाता है जो वास्तव में अनादि से अनन्त काल तक ईश्वर के साथ हैं। उन्हीं के द्वारा सबुछ उत्पन्न हुआ। वह ‘‘शब्द‘‘ जो देह बना सृष्टिकर्ता भी हैं और उद्धारक भी। सब कुछ के सृष्टिकर्ता येसु मनुष्य बने ताकि हम मुक्ति प्राप्त कर सकें।

सुसमाचार में हमने सुना कि ईश्वर के भेजे हुए संत योहन बपतिस्ता ज्योति का साक्ष्य देने आये। प्रभु येसु ही वह संसार की ज्योति हैं। ज्योति का कार्य है अंधकार में मानव को मार्ग दिखाना। प्रभु येसु पिता परमेश्वर की ओर की यात्रा में मार्गदर्शक हैं। ज्योति का संघर्ष हमेशा अंधकार की ताकतों से रहता है। अंधकार की ताकतें ज्योति को मिटाना चाहती हैं। आधुनिक युग में भी प्रकाश का संघर्ष अंधकार की ताकतों से जारी है। इस दुनिया में अंधकार की बहुत सी ताकतें हैं जैसे अज्ञानता, अंधविश्वास, आतंकवाद आदि। हम खीस्तीय ज्योति की संतान हैं। इसलिये हमें अन्य लोगों से अलग व्यवहार करना चाहिये। अंधकार के खिलाफ ज्योति के संघर्ष में हमें भी भाग लेना चाहिये। रिश्वत लेने वालों के बीच रहकर ईमानदारी का परिचय देने वाले, नाना प्रकार के प्रलोभनों के बावजूद भी पाप से दूर रहने वाले, कठिन प्रयत्न से अपनी जीविका चलाने वाले- सब अंधकार की ताकतों के खिलाफ ज्योति के संघर्ष में भाग लेने वाले हैं। हम में से हर एक को चाहिये कि इस संघर्ष में ज्योति का साथ दे। योहन ज्योति का साक्ष्य देने आये थे। हम भी इसी प्रकार ज्योति का साक्ष्य देने हेतु बुलाये गये हैं।

मुक्तिदाता को अपनों ने ठुकराया तथा तिरस्कृत किया। यहूदी होकर दाऊद के वंश में इब्राहीम की संतान के रूप में पैदा हुये येसु को यहूदियों ने ही ठुकराया था। जिस किसी ने प्रभु पर विश्वास किया, उसे ईश्वर की संतान बनने का अधिकार प्राप्त हुआ। हम भली भांति जानते हैं कि बपतिस्मा प्राप्त लोगों के लिये इस दुनिया में रहते समय और उसके बाद भी अनेक अधिकार प्राप्त हैं क्योंकि वे ईश्वर की संतान हैं।

संत योहन हमेशा प्रभु के साथ थे। वे कहते हैं कि उन्होंने प्रभु की महिमा देखी है। संत योहन प्रभु के रूपांतरण के भी गवाह थे। योहन के सुसमाचार के अनुसार प्रभु का हर कार्य ईश्वर की महिमा के लिये है। उनकी परिपूर्णता से हम सब को अनुग्रह पर अनुग्रह मिले हैं। बेथलेहेम का बालक येसु हम सबों के लिये अनुग्रहदाता है। हम में से हर एक के पास जो भी है वह सब उन्हीं का दिया हुआ दान है। हमने अपनी क्षमता से कुछ भी नहीं पाया है। संत योहन करीब 100 साल तक जीवित रहे। उन्होंने अपने और कलीसिया के बीते जीवन पर दृष्टि दौड़ाते हुये कहा, ‘‘अनुग्रह पर अनुग्रह प्रभु से पाया।‘‘ हम भी चारों तरफ देखेगें तो अनुग्रह ही अनुग्रह नज़र आयेगा। हम पक्का विश्वास रखें कि प्रभु हमें और अधिक अनुग्रह प्रदान करने में सक्षम हैं एवं इच्छुक भी।
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