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Sunday Homilies - March 23, 2014
चालीसे का तीसरा इतवार
By फादर आनन्द मुटूंगल

आज का सुसमाचार प्रभु येसु की समारी स्त्री से मुलाकात की घटना का विवरण हमारे सामने प्रस्तुत करता है। प्रभु के समय के फिलीस्तीन की लम्बाई उत्तर से दक्षिण तक 120 मील थी। फिलीस्तीन तीन भागों में विभाजित किया गया था। उत्तर में गलीलिया प्रांत, दक्षिण में यहूदिया और मध्य में समारिया स्थित थे। समारिया के लोगों को समारी कहते हैं। यहूदी समारियों से नफ़रत करते थे तथा उन्हें तुच्छ मानते थे। इसी कारण जब किसी यहूदी को यहूदिया से गलीलिया या गलीलिया से यहूदिया जाना पड़ता था तो वे समारिया न होकर यर्दन नदी पार करके पूर्व दिशा से निकल जाते थे। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु समारिया से होकर गुज़रते हैं। करीब मध्याह्न में वे समारिया के सुख़ार नामनगर पहुँचते हैं। भरी धूप में चलकर वे और उनके शिष्य भूखे और प्यासे हो चले थे। साथ ही वे बड़ी कान भी महसूस कर रहें थे। प्रभु याकूब के कुँए के पास बैठ जाते हैं और शिष्य उनके और अपने लिये खाने का प्रंबंध करने के लिये निकल जाते हैं।

इतने में एक समारी स्त्री कुँए के पास पानी भरने आती है। प्रभु येसु अपनी प्यास बुझाने के लिये उससे पानी माँगते हैं। इस पर वह आष्चर्यित होकर प्रष्न करती है कि आप यहूदी होकर भी मुझ समारी स्त्री से पीने के लिये पानी माँगते हैं? इस पर प्रभु येसु उससे कहते हैं, ’’यदि तुम ईश्वर का वरदान पहचानती और यह जानती कि वह कौन है, जो तुमसे कहता है- मुझे पानी पिला दो, तो तुम उससे माँगती और वह तुम्हें संजीवन जल देता।’’ थोड़े ही समय में ऐसा लगता है कि प्यासा व्यक्ति ही पानी पिलाने वाला बन जाता है और पानी भरने वाली प्यासी। इन वचनों को ईशशास्त्री और बाइबिल के विद्वान बहुत ही अर्थगर्भित मानते हैं। ईश्वर हृदय को देखते हैं और आंतरिक भावनाओं को समझते हैं। प्रभु ने उस समारी स्त्री की बैचेनी को पहचान लिया और इसलिये भले गड़रिये होने के नाते उस भेड़ की प्यास बुझाने का प्रयत्न करते हैं।

विद्वानों का यह मानना है कि प्रभु और समारी स्त्री के बीच बहुत लम्बी बातचीत हुई होगी लेकिन बाइबिल में इसका संक्षिप्त रूप ही प्रस्तुत किया गया है। शायद उस स्त्री ने अपनी कठिनाईयों और मुसीबतों से भरी जिन्दगी को प्रभु के सामने प्रकट किया और अपने टूटे हुए दिल को राहत दिलाने की कोशिश की। जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ती है उसे यह महसूस हुआ कि प्रभु उसके छिपे हुए जीवन की हर सच्चाई को परखने वाले मसीह ही हैं।

प्रभु को मसीह के रूप में पहचानने पर वह समय नहीं गँवाती बल्कि अपना घड़ा वहीं छोड़कर, नगर वापस जाकर नगरवासियों के सामने मसीह के आगमन का सुसमाचार घोषित करती है। उसकी घोषणा इतनी प्रभावशाली होती है कि नगरवासी प्रभु से अनुरोध करते हैं कि प्रभु उनके यहाँ रह जाये। इसपर प्रभु दो दिन वहीं रह जाते हैं। प्रभु को अपने बीच में पाकर नगरवासी उनपर विश्वास करने लगते हैं। उनका विश्वास इतना पक्का बन जाता है कि वे उस स्त्री से कहते हैं, ’’अब हम तुम्हारे कहने के कारण ही विश्वास नहीं करते। हमने स्वयं उन्हें सुन लिया है और हम जान गये हैं कि वह सचमुच संसार के मुक्तिदाता है।’’

पूरे घटनाक्रम पर जब हम ध्या देते हैं तो हमें यह ज्ञात होता है कि प्रभु येसु खीस्त की पहचान विभिन्न चरणों में होती है। शुरू में वे यहूदी के रूप में पहचाने जाते हैं, फिर नबी के रूप में, फिर मसीह के रूप में और अंत में संसार के मुक्तिदाता के रूप में। साथ-साथ हम समारी स्त्री में भी कुछ परिवर्तन देखते हैं। यह भी चरणबद्ध रूप से होता है। शुरू में वह प्रभु से अपरिचित थी। धीर-धीरे वह प्रभु के वचनों में रूची लेने लगी। उसकी रूचि धीरे-धीरे बढ़ती है और वह प्रभु से हमेशा के लिये प्यास बुझाने वाला संजीवन जल माँगने लगती है। इसके बाद उसका विश्वास बढ़ता है और वह एक विश्वासी बनती है। अंत में हम देखते हैं कि वह एक शिष्य या प्रेरित का काम करने लगती है। इसके साथ-साथ हमें यह भी देखने को मिलता है शुरू में वह अपने जीवन को प्रभु से छिपाती है। लेकिन जैसे संवाद प्रगति करता है तो वह खुद अपने जीवन के पहलुओं से पर्दे हटाती जाती है। अंत में प्रभु को मुक्तिदाता मानकर अपने पापों को स्वीकार करते हुए एक नया जीवन शुरू करने का प्रण लेती है।

यह पूरी घटना हमारे जीवन के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित और चित्रित करती है। अगर वह समारी स्त्री प्रभु के पास नहीं आती तो शायद ही उसके जीवन में बदलाव आता। इसी प्रकार खीस्तीय जीवन में आगे बढ़ने के प्रथम चरण में हमें प्रभु के सान्निध्य में आना चाहिये। हमें प्रभु से मुलाकात करने के कई मौके मिलते हैं। क्या हम इन अवसरों का लाभ उठाते हैं? जब हम प्रभु से मिलते हैं तो शायद हम कुछ बातों को छिपाना चाहते हैं। क्योंकि हम यह नहीं जानते हैं कि प्रभु से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। प्रभु हमारे साथ हमें मन-परिवर्तन की प्रेरणा देते हुए गड़ेरिए के रूप में हमेशा उपस्थित रहते हैं। जितना हम अपने आप को उनके सामने खोल देते हैं उतना ही वे हमें अपनी कृपाओं से भर सकते हैं। जितनी उदारता हम दिखाते हैं उससे कहीं ज्यादा हमें मार्गदर्शन देने में ईश्वर उदार बनते हैं।

तो आइए उसी प्रेममय ईश्वर के सामने अपनी कमियों, त्रुटियों और कमज़ोरियों को स्वीकार करते हुए अपने जीवन में परिवर्तन लाने का दृढ़-संकल्प करें तभी हम विश्वास के साथ यह घोषणा कर पायेंगे कि प्रभु येसु न केवल मेरे और आपके मुक्तिदाता हैं बल्कि समस्त संसार के मसीह और मुक्तिदाता हैं।

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