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Sunday Homilies - March 30, 2014
चालीसे का चौथा इतवार
By फादर डेविडसन वी. एम.)

चालीसा काल तैयारी का समय है।  हम पश्चात्ताप एवं मन परिवर्तन के द्वारा अपने आप को आगामी पास्का के लिये तैयार करते हैं।  इसमें प्रार्थना, उपवास, दान, त्याग, भले कार्य आदि हमारी मदद करते हैं।  अगर ये काम हम सिर्फ दिखावे या वाहवाही लूटने के मकसद से करते हैं तो इससे कोई लाभ नहीं क्योंकि ईश्वर हमारे हृदय को देखते हैं।  इसलिये ज़रूरी है कि हम ये सब ईश्वर के प्रेम से प्रेरित होकर उनके प्रेम के लिये करें।  तभी इस पास्का में सही मायने में हम आनंदित हो सकते हैं। 

आज माता कलीसिया भी प्रवेश भजन के माध्यम से हमें खुशी मनाने को कहती है।  ‘‘हे येरुसालेम आनन्द मना!  येरुसालेम के सब प्रेमियों उसके साथ आनन्द मनाओ।  जो उसके लिये दुःखी थे, अब उल्लास का अनुभव करो और उसके मधुर सांत्वना का पान कर खुश हो जाओ।‘‘  जिस प्रकार किसान अपनी कड़ी मेहनत को खेत में लहलहाते हुये फ़सल के रूप में देखकर आने वाली उपज के ख्याल से आनन्दित होता है, जिस प्रकार एक विद्यार्थी अपनी लगन को परीक्षा में साकार होता देख आने वाले अच्छे परिणाम के ख्याल से आनन्दित होता है।  जिस प्रकार एक प्रतियोगी अपने अभ्यास को प्रतियोगिता में रंग दिखाता देख प्राप्त होने वाले पदक के ख्याल से खुश होता है, जिस प्रकार एक निमार्णकर्ता अपने प्रयासों को एक अंजाम तब पहुँचता देख उससे प्राप्त होने वाली ख्याति एवं मुनाफे के ख्याल से खुश होता है, उसी प्रकार हम खीस्तीय चालीसा काल में सक्रियता से भाग लेते हुए खीस्त के पुनरुत्थान में भाग लेने की बात सोचकर आनन्दित होते हैं।

आज के पहले पाठ में हम ईश्वर द्वारा दाऊद को इस्राएल के दूसरे राजा के रूप में चुनते हुए पाते हैं।  दाऊद एक साधारण चरवाहा था।  उसकी कोई खास पहचान नहीं थी।  उसके पिता जेस्से ने उसके सात भाईयों को नबी समूएल के सामने प्रस्तुत किया पर उन्होंने दाऊद पर ध्यान नहीं दिया।  पर ईश्वर ने जो सबों के हृदयों को देखते हैं दाऊद पर ध्यान दिया।  यह जानते हुये भी कि भविष्य में वह उनके विरुद्ध अपराध करेगा, उनके साथ विश्वासघात करेगा वे उसे चुनते हैं।  वे उसके सच्चे पश्चात्ताप को भी देखते हैं। 

ईश्वर द्वारा दाऊद को चुना जाना हममें नई आशा का संचार करता है।  हम सब कमज़ोर हैं।  हममें कई खामियाँ विद्यमान हैं।  हमारी लाख कोशिशों के बावजूद भी हम बार-बार पाप में गिरते हैं और अंधकार के वश में हो जाते हैं।  पर हमें डरने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि अगर हम सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करते हैं तो हम ईश्वर को ग्राह्य होंगे।  वे हमें सच्ची ज्योति प्रदान करेंगे और हमें पाप के अंधकार से छुटकारा दिलायेगंे।  यही हमें आनन्दित करता है।

संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमसे कहते हैं, ‘‘आप लोग पहले अंधकार थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ज्योतिबन गये हैं।  इसलिये ज्योति की संतान की तरह आचरण करें।‘‘  अंधकार से सब घबराते हैं।  शायद हमें भी अंधकार से डर लगता होगा।  एक बार कुछ दोस्तों में शर्त लगी कि रात के अंधेरे में शमशान के बीच लगे पेड़ पर जो कील ठोंक कर आयेगा वह निडर माना जायेगा।  उनमें से एक साहस कर रात के अंधकार में शमशान पहुँचा।  कुछ देर बाद उसके मित्रों ने एक भयानक चीख सुनी।  पर जब बहुत देर तक वह नहीं लौटा तो वे हिम्मत करके वहाँ पहुँचे।  उन्होंने उसे मूर्छित पाया।  हुआ यह था कि घबराहट में गलती से उससे अपने कुर्त्ते पर कील मार दी थी और जब वह वापस जाने के लिये उठा तो कील की पकड़ से उसे लगा कि किसी ने उसे पकड़ लिया है और वह चीखकर बेहोश हो गया।

अगर यह साधारण सा अंधकार इतना भयावना है तो हमारे हृदय पर छाया पाप का अंधकार कितना डरावना और खतरनाक होगा।  अगर यह साधारण सा अंधकार किसी को मूर्छित कर सकता है तो वह असाधारण अंधकार हमारे हृदय को कितनी क्षति पहुँचा सकता है। 

ज्योति से कोई नहीं डरता।  सभी प्रकाश में अपने आप को सुरक्षित पाते हैं।  ईश्वर हमारी ज्योति हैं और जो उनके पास जाते हैं उनके पास पाप का अंधकार फटक भी नहीं सकता।

तेल से अभ्यंजित होते ही ईश्वर का आत्मा दाऊद पर उतर गया और उसी दिन से उसके साथ विद्यमान रहा।  बपतिस्मा में हमारे साथ ठीक यही होता है।  तेल से अभ्यंजित होते ही पवित्र आत्मा हम पर छा जाते हैं और हम एक नये व्यक्तित्व को ग्रहण करते हैं।  वे हमारे हृदयों को ज्योतिर्मय कर देते हैं जिससे हम भी खीस्त के समान इस संसार में चमकें।  पर जिस प्रकार सूर्य की तेज़ चमक भी बादलों के कारण क्षीण हो जाती है उसी प्रकार पाप के बादल हमारे ज्योतिर्मय हृदय, जीवन आदि पर ग्रहण लगा देते हैं।  जिस प्रकार दाऊद को नई बुलाहट, नई मंजिल दी गई थी ठीक उसी तरह हमें भी नई बुलाहट दी जाती है, ज्योति की संतान के समान आचरण करते हुये प्रभु के लिये स्वयं को तैयार करने की। 

आज के सुसमाचार में हम प्रभु को एक नेत्रहीन को दृष्टि प्रदान करते हुये पाते हैं।  फरीसियों का घमण्ड एवं पूर्वाग्रह उन्हें इस चमत्कार को स्वीकारने नहीं देता।  अंधे व्यक्ति के माता-पिता के साक्ष्य पर कि वह उन्हीं का बेटा है और वह जन्म से अंधा था, वे इसे पापी का चमत्कार करार देते हैं, जिसका शैतान के साथ गठबंधन है।  उस दृष्टि प्राप्त व्यक्ति के यह कहने पर कि पापी के द्वारा यह सम्भव नहीं हैं वे उसे समाज से बहिष्कृत कर देते हैं।  वे निष्चिन्त थे कि यह कार्य ईश्वर की तरफ से नहीं था बल्कि एक ढ़ोंगी के तरफ से था।

एक सूफ़ी कहानी के अनुसार एक बार एक आदमी अचानक जीवित होकर शवपेटी के अंदर से ढक्कन को पीटने लगा।  ढक्कन को उठाया गया और वह आदमी उठकर बैठ गया।  उसने एकत्रित भीड़ से कहा आप लोग यह क्या कर रहे हैं?  मैं मरा नहीं हूँ।  उसकी इस बात को मौन अविश्वास के साथ लिया गया।  एक शोक मनानेवाले ने आखिरकार कहा, ‘‘मित्र डॉक्टर एवं पुरोहित ने प्रमाणित किया है कि तुम मर चुके हो।  इसलिये तुम मर चुके हो।‘‘  और उन्होंने उसे विधिवत् दफना दिया। 

फरीसियों के लिये मसीह के बारे में उनकी सोच पूर्ण सच्चाई थी।  चूँकि येसु मसीह उनकी सोच में कहीं ठीक नहीं बैठते थे वे उनका तिरस्कार करते हैं और सब कुछ देखते हुये भी अंधे बने रहते हैं, उन लोगों के समान जिन्होंने जीवित व्यक्ति को ही दफना दिया था।

कई बार हम भी उन लोगों के समान मसीह को, उनके वचनों एवं कार्यो को दफना देते हैं और अंधकार में बने रहते हैं।  उस नेत्रहीन व्यक्ति ने क्रमशः खीस्त को जाना।  पहले तो वह उनसे बहुत प्रभावित हुआ फिर उसने उनमें एक अद्भुत चमत्कारी देखा, फिर ईश्वर के द्वारा भेजे हुये एक नबी को और अंत में ईश्वर के पुत्र को।  फरीसियों की तुलना में वह नेत्रहीन ईश्वर के ज्ञान में बढ़ता गया।  बपतिस्मा प्राप्त कर लेने मात्र से हममें कार्यरत ज्योति एवं अंधकार की शक्तियों के बीच तनाव समाप्त नहीं हो जाता।  कई बार अंधकार की शक्तियाँ हम पर भारी पड़ती हैं और हमारे पैर डगमगा जाते हैं और हम ईश्वर से दूर चले जाते हैं।  और इसलिये इस चालीसा काल की हमें बार-बार ज़रूरत पड़ती है। 

सुसमाचार में वर्णित घटना आज भी हमारे जीवन में घटित होती है।  खीस्त अपनी शिक्षा, उदाहरण एवं जीवन से हर घड़ी हमारा सामना करते हैं।  हमें चुनौती देते हैं।  अगर हम उस दृष्टिहीन व्यक्ति के समान प्रभु के आदेशों का पालन करेंगे तो वे हमारे हृदयों के अंधकार को दूर कर उसे अपनी ज्योति से भर देंगे।

आइए हम प्रभु के मार्गदर्शन पर चलते हुए अपने हृदयों को ज्योतिर्मय बना ले और ज्योति की संतान की तरह जीवन यापन करें और इस प्रकार प्रभु में आनन्द मनायें।

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