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Sunday Homilies - April 13, 2014
खजूर इतवार
By फादर अंथोनी आक्कानाथ

राखबुध से प्रारंभ प्रभु येसु के दुखभोग का स्मरण करते हुए चालीस दिन बीत गये हैं। हमारे माथे पर क्रूस के निशान के साथ राख लगाकर आह्वान किया गया था कि हम पाप से मुख मोड़कर सुसमाचार को ग्रहण करें या यह याद दिलाया गया कि याद रखो तुम मिट्टी से बने हो और मिट्टी में मिल जाओगे। प्रभु येसु के शिष्यों के लिये यह सप्ताह सबसे पवित्र सप्ताह माना गया है। आज का दिन कलीसिया के लिये अनोखा दिन है। आज हम सुसमाचार के दो भागों को पढ़ते हैं। एक पवित्र मिस्सा बलिदान के पूर्व डालियों की आशिष के समय और दूसरा पाठ मिस्सा बलिदान के दौरान। आज क्यों दो पाठ सुनाये गये?

यह इतवार अनेक नामों से जाना जाता है- खजूर इतवार, दुखभोग इतवार, खजूर-दुखभोग इतवार आदि। इस रविवार में कई विरोधाभास हैं। यह असीम आनंद से प्रारंभ होता है जहाँ प्रभु गधे पर सवार हो कर येरुसालेम में प्रवेश करते हैं जैसा कि नबियों द्वारा भविष्यवाणी की गई थी। परन्तु हमारा यह आनंद विषाद में बदल जाता है जब हम प्रभु येसु के दुखभोग के बारे में सुनते हैं।

इस रविवार में इतना विरोधाभास क्यों? इसका उत्तर उन सुसमाचार पाठों में मिलेगा जिन्हें हम इस सप्ताह के आगामी दिनों की पूजन-विधियों मंे सुनेंगे। ये कलीसिया के लिए पवित्रतम दिन हैं। इसलिये इसे पवित्र सप्ताह कहा गया है। इसका समापन शनिवार के रात्रि-जागरण पर होगा जिसे संत अगुस्तीन पवित्र जागरणों की माँ कहते हैं।

पवित्र शुक्रवार को प्रभु येसु के दुखभोग को याद किये बिना हम पास्का रविवार में प्रवेश नहीं कर सकते। पवित्र सप्ताह में हम घोशित करते हैं कि मृत्यु से जी उठने के पहले प्रभु ने हमारे खातिर घोर दुख सहा और हमारे लिये मर गये। हम नवीन और अद्भुत रूप से प्रभु में अपने विश्वास को मजबूत करते हैं। आज हम जिन पाठों को सुनते हैं निश्चय ही वे हमारे आराम पसंद मानवीय स्वाभाव पर कठुराघात करते हैं।

सामान्य दिनों के सुसमाचार पाठों को सुनने से मिलने वाला आनंद उस समय दुख में परिवर्तित हो जाता है जब हम प्रभु येसु के दुखभोग को पढ़ते हैं। आज के पाठ में हमने उस भीड़ के बारे में सुना जो प्रभु येसु का जयजयकार कर रही थी। उसे अचानक क्या हो गया था? क्यों वे सब पलट कर प्रभु के विरुद्ध हो गये? मैं ऐसा नहीं समझता। मैं सोचता हूँ कि वहाँ दो प्रकार के लोग थे। एक येरुसालेम नगर के भीतर और दूसरे बाहर।

इस पवित्र सप्ताह के पाठों का केन्द्र बिन्दु प्रभु येसु हैं। परन्तु यहाँ विरोधाभास है। एक स्थान पर प्रभु येसु का जय जयकार गूँजता है, वहीं दूसरी तरफ वे इस कदर अपमानित किये जाते हैं जो किसी भी मानवीय सहनशक्ति से परे है। प्रभु येसु को महिमा और सम्मान सिर्फ एक दिन के लिये दिया गया और कुछ ही दिनों के अन्दर उन्हें एक अपराधी की भांति पकड़ कर मौत के घाट उतारा गया।

ईश्वर के पुत्र को सिर्फ एक रविवार के लिये क्षणिक महिमा दी गई है। बृहस्पतिवार के दिन वे गेथसेमनी बाग में प्राणपीड़ा भोगते हैं। इसी सप्ताह शुक्रवार को उनपर मुकदमा चलाकर क्रूस पर चढ़ाये जाने की आज्ञा दी जाती है, उनके शिष्य भी उन्हें त्याग देते हैं और उन्हें क्रूस पर अपमानजनक मौत प्राप्त होती है।

आज के पाठ उस भारी भीड़ पर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं, जो प्रभु येसु को राजा मानकर सड़क पर कपडे़ और डालियाँ बिछाकर, जयजयकार करते हुए उनका स्वागत करती है। उसने राजा दाऊद के राज्य की और मसीह के आगमन के महिमामय क्षणों की परिकल्पना की। दूसरी ओर भीड़ पिलातुस से प्रभु येसु को मृत्युदण्ड दिये जाने के लिये शोर मचाती हुई कहती है इसे क्रूस दीजिये, इसे क्रूस दीजियेनिश्चय ही येरुसालेम नगर के अन्दर की यह भीड़ उस येरुसालेम के बाहर की भीड़ से भिन्न थी। हमें यह मनन् करना चाहिये है कि हम किस भीड़ में शामिल हैं?

येरुसालेम नगर के बाहर की भीड़ में यहूदी समाज द्वारा बहिष्कृत लोग थे जो प्रभु येसु के प्रति उत्साहित थे। ये वे लोग थे जिनका जीवन दुःखों और कष्टों से भरा हुआ था। वे सुसमाचार में वर्णित ऊबड़-खाबड़ मार्ग थे, जिन्हें मेज़ों पर कभी भी प्रमुख स्थान नहीं दिया गया, जिन्हें भोज में आमंत्रित नहीं किया गया और मंदिर और सभागृहों में कभी स्थान नहीं दिया गया। अपनी तंगी में भी प्रभु येसु का स्वागत करना वे अच्छी तरह जानते थे। प्रभु येसु ने उन पर प्रकट किया था कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने उन्हें नहीं भुलाया है बल्कि वे उन्हें प्यार करते हैं। प्रभु येसु ने उन्हें अपनाया, बीमारियों से चंगा किया और उनके पापों को क्षमा किया था। वे भी समझते थे कि प्रभु येसु भी उन्हीं की तरह तिरस्कृत और बहिष्कृत हैं और जिसे ईश्वर ने ऊपर उठाया है।

क्या हम येरुसालेम के बाहर की येसु की जयजयकार करने वाली भीड़ में हैं या अन्दर की भीड़ में जो प्रभु येसु पर मुकदमा चलाती है?

पुण्य बृहस्पतिवार, पवित्र शुक्रवार और पास्का रविवार को त्रिदिवस कहते हैं। यह प्रत्येक दिनमें प्रभु येसु के दुःखभोग को गहराई से समझाता और महसूस कराता है। इस पवित्र सप्ताह में हम प्रभु येसु के साथ एक होने के लिये अपने आप में परिवर्तन लायें। हम स्वयं को प्रभु को समर्पित करें ताकि वे हमें बदल सकें। हम हमारी प्रार्थनाओं को बढ़ायें, प्रायश्चित और भले कार्यों द्वारा प्रभु की कलीसिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करें।

हम पुण्य बृहस्पतिवार की संध्या को प्रभु के आखिरी भोज को मिस्सा बलिदान में सम्पन्न करते हैं जहाँ प्रभु येसु द्वारा शिष्यों के पैर धोये जाने की याद में पल्ली पुरोहित पल्ली के कुछ भाइयों के पैर धोते हैं। इस बलिदान में अधिक रोटियों पर आशिष की प्रार्थना पढ़ी जाती है क्योंकि पवित्र शुक्रवार को मिस्सा बलिदान नहीं अर्पित किया जाता। पुण्य बृहस्पतिवार को मिस्सा बलिदान के बाद वेदी के सभी कपड़ों को हटा दिया जाता है एवं पवित्र परमप्रसाद को पवित्र संदूक से हटा कर संदूक को खाली छोड़ दिया जाता है एवं अर्धरात्रि तक पवित्र परमप्रसाद की आराधना की जाती है। खाली संदूक इस बात का प्रतीक है कि प्रभु येसु मर गये हैं। एक बार पवित्र शुक्रवार को मैं अपनी पल्ली में खाली संदूक को मनन् करते हुए देख रहा था तब मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा- उन्होंने प्रभु येसु के साथ क्या किया है? शायद प्रभु के शिष्यों ने भी आपस में ऐसे ही प्रश्न किये हों?

पवित्र शुक्रवार की पूजा विधि दोपहर और संध्या पूर्व समय में की जाती है। हम उस दिन सुसमाचार द्वारा प्रभु येसु के दुखभोग का स्मरण करते हैं एवं पुरोहित सभी मनुष्यों के लिये प्रायश्चित की मध्यस्था करते हैं। उसके बाद क्रूस की आराधना की जाती है जिस पर हमारे मुक्तिदाता ने अपने प्राण त्यागे थे। अंत में पुण्य बृहस्पतिवार को आशिष दे कर रखे गये अतिरिक्त परमप्रसाद को हम ग्रहण करते हैं।

शनिवार की अर्धरात्रि को हम प्रभु येसु के मृतकों में जी उठने का पर्व मनाते हैं। यह पास्का पर्व है- मृत्यु से जीवन की ओर, अंधकार से ज्योति की ओर और पाप से मुक्ति की ओर जाने का पर्व। हम प्रभु येसु की मृत्यु और कब्र में दफ़न की घटनाओं से उभर कर घोशित करते हैं कि प्रभु येसु जी उठे हैं- वे जीवित हैं। आइए हम अपने को आनेवाले सप्ताह की धार्मिक विधियों के लिए तैयार करें ताकि हमारे लिए भी इस साल का पास्का त्योहार नवीनीकरण का अनुभव ला सके।

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