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Sunday Homilies - May 11, 2014
पास्का का चौथा इतवार
By फादर प्रभुदास तिर्की

‘‘विश्वास उन बातों की स्थिर प्रतीक्षा है, जिनकी हम आशा करते हैं, और उन वस्तुओं के अस्तित्व के विषय में दृढ़ धारणा है, जिन्हें हम नहीं देखते।‘‘ (इब्रानियों 11:1) मनुष्य का विश्वास ही ईश्वर को जानने, लोगों को समझने और भले बुरे की परख कर सकने की जिज्ञासा उत्पन्न करता है। ईश्वर के प्रति ईमानदार, माता-पिता के प्रति प्रेम, पति-पत्नी के बीच अटूट संबंध, बाल-बच्चों के प्रति समर्पण को विश्वास ही बरकरार रख सकता है। मालिक का नौकर के साथ, गडे़रिये का भेड़ों के साथ अच्छे संबंध का होना पारस्परिक विश्वास के ज़रिए ही देखने को मिलता हैं। आज के तीनों पाठ व्यक्तिगत जीवन में विश्वास की क्रियाशीलता को उजागर करते, परमेश्वर के पुत्र ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने के प्रति आत्मग्लानि की भावना जगाते तथा हमारे प्रेरितिक कार्य को जिम्मेदारी के साथ निभाने का आह्वान करते हैं।

सुसमाचार में येसु स्वयं को गड़ेरिया और भेड़शाला का द्वार कहते हैं। साधारण भाषा में गडे़रिये को चरवाहा या मेषपाल कहा जाता है, परन्तु शाब्दिक अर्थ में गड़ेरिया वह है, जो किसी झुण्ड की अगुवाई करता और मार्गदर्शन देता है, चाहे वह सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक तथा अन्य कार्य क्यों न करता हो। खीस्तीय समाज ने येसु को भले गडे़रिये की संज्ञा दी है तथा खीस्तीय विश्वासियों को भेड़ माना गया है। क्योंकि प्रभु येसु खीस्त ने कहा है, ‘‘भला गडे़रिया मैं हूँ‘‘ (योहन 10:11)। अंत में येसु खीस्त हमारे लिए स्वयं को क्रूस पर न्योछावर कर भले गडे़रिये का परिचय देते हैं।

आज के सुसमाचार के माध्यम से येसु खीस्त कहते हैं, ‘‘भेड़शाला का द्वार मैं हूँ‘‘। इस वाक्य से येसु खीस्त का तात्पर्य यह है कि वे जीवन और मृत्यु के द्वार हैं, वे ही पूर्ण जीवन के स्रोत तथा सुरक्षित द्वार हैं। जो व्यक्ति येसु खीस्त की शिक्षा को ग्रहण करता है और उस पर चलता है उसके लिये येसु खीस्त स्वर्ग के द्वार खोल देते हैं और उसे ईश्वरीय राज्य मेें मुक्ति के सहभागी बनाते हैं। लेकिन जिसके हृदय में दूसरों के प्रति प्यार नही है वह मज़दूर के समान कुछ पाने के मकसद से काम करता है और हर वक्त कुछ कमाने की कोशिश करता रहता है। उसे दूसरों की भलाई की कोई चिन्ता नही है। वे वास्तव में चोर और डाकू हैं। क्योंकि चोर और डाकू सीधे मार्ग से प्रवेश नहीं करते बल्कि घर के पिछवाडे से आते हैं। चोर और डाकू का उद्देश्य भेड़ो को चुराने और नष्ट करने का होता है, इसलिये येसु खीस्त कहते है, ‘‘जो फाटक से भेड़शाला में प्रवेश नहीं करता, बल्कि दूसरे रास्ते से चढ़कर आता है, वह चोर और डाकू है‘‘। चोर और डाकू का जीवन असुरक्षित है क्योंकि उनके मन में हमेशा डर, आशंका और अशांति बनी रहती है। उनके मन में घबराहट उत्पन्न होती है और स्वाभाविक स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है।

येसु खीस्त फिर कहते हैं, ‘‘जो फाटक से प्रवेश करता है वही भेड़ों का गडेरिया है‘‘। येसु खीस्त कहना चाहते हैं कि वे ही भले गड़ेरिये हैं, और हम सब उनकी भेड़ें। येसु खीस्त ही हमारे मार्गदर्शक हैं, गुरु तथा अगुवा हैं। यदि हम उनके पीछे-पीछे चलेंगे तो हमें परिपूर्ण जीवन तथा मुक्ति प्राप्त होगी। सच कहा जाये तो जीवन में बच्चों के मार्गदर्शन के लिये एक गुरु की आवश्यकता होती है, भेड़ों को सुमार्ग पर ले जाने के लिये एक गड़ेरिये की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार मानव मुक्ति के लिये येसु खीस्त की शिक्षा पर चलना ज़रूरी होता है। येसु खीस्त से दूर रहकर अनन्त जीवन की प्राप्ति असंभव है। आज सम्पूर्ण संसार को येसु खीस्त की आवश्यकता है। इस आधुनिक युग में सारा संसार माया मोह में फँस गया है। सब तरफ शोषण, अत्याचार, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, हिंसा, नशापान, वासना, घमंड आदि अवगुणों का बोल-बाला है। मानव जाति ने इन अवगुणों में लिप्त, शैतान के चंगुल में फंसकर स्वर्ग राज्य के द्वार को बंद कर दिया है। इन परिस्थितियों से छुटकारा दिलाने तथा मुक्ति प्रदान करने के लिये येसु खीस्त की आवश्यकता है। अतः येसु खीस्त ही एक ऐसे महान मुक्तिदाता हैं, जो सम्पूर्ण संसार को पापमय जीवन से छुटकारा दिला सकते हैं। पापमय जीवन द्वारा मनुष्य ने स्वर्ग के द्वार को बंद कर दिया है। लेकिन येसु ने अपने क्रूस मरण द्वारा पाप को नष्ट कर स्वर्ग के द्वार को पुनः खोल दिया है। उन्होंने हमें अपने पवित्र लहू से शुद्ध करके स्वर्ग राज्य में प्रवेश के योग्य बनाया है। अतः येसु खीस्त मार्ग, सत्य और जीवन हैं।

आज के पहले पाठ में संत पेत्रुस पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर निर्भीता से यहूदियों को प्रवचन देते हुए अनुरोध करते हैं कि वे पश्चात्ताप करें और येसु के नाम पर बपतिस्मा ग्रहण करें। ‘‘क्योंकि आप लोगों ने ईसा को क्रूस पर चढ़ाया, ईश्वर ने उसी ईसा को प्रभु भी बना दिया है और मसीह भी‘‘ (प्रेरित-चरित 2:36)। इस वाक्य के द्वारा लोगों में आत्मग्लानि उत्पन्न हुई और मन-परिवर्तन हुआ। उन्होंने पष्चात्ताप की भावना को प्रकट किया तथा ईश्वरीय विश्वास में वफादार न होने की अपनी कमज़ोरी को उजागर कर दिया। इसलिये प्रेरितों को सुनने वाले पूछते हैं, ‘‘हमें क्या करना चाहिये‘‘ (प्रेरित-चरित 2:37)। इस वाक्य के द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य चाहे कितनी भी गलती क्यों न करें लेकिन जब उसे अपनी गलतियों का अहसास होता है तो उसमें दुबारा कुकर्म न करने की इच्छा जागृत होती है तथा एक अच्छा जीवन जीने की अभिलाषा उत्पन्न होती है। ईश्वर भी उसके पापों को अनदेखा करते, उसपर दया दिखाते और उसके पापों को क्षमा करते हैं। ईश्वर किसी के पापों का लेखा नहीं रखते, न ही पापी मनुष्य से घृणा करते बल्कि उस व्यक्ति के मन परिवर्तन का इंतजार करते हैं। येसु खीस्त कहते हैं, ‘‘मैं धर्मियों को नहीं पापियों को पष्चात्ताप के लिये बुलाने आया हूँ‘‘ (लूकस 5:32)

पश्वात्ताप एक ऐसी भावना है जो अंधकार में डूबे हुए इन्सान को रोशनी दिखाती है, या जीवन देती है। इस प्रकार वह पुनः ईश्वर से संयुक्त होता है। बपतिस्मा के द्वारा हम नया जीवन प्राप्त करते हैं तथा ईश्वर के पुत्र-पुत्रियाँ बनते हैं। आज के दूसरे पाठ में संत पेत्रुस धैर्य के साथ दुख भोगने वाले मसीह का वर्णन करते हैं जिन्होंने न कोई पाप किया, न ही किसी तरह की गलती की, बल्कि एक अच्छे चरवाहे की तरह झुण्ड की रखवाली की तथा मनुष्यों की मुक्ति के लिये स्वयं को क्रूस पर न्योछावर कर दिया। अतः संत पेत्रुस विश्वासियों को आह्वान करते हुए कहते हैं कि हमने मसीह का बपतिस्मा ग्रहण किया है, इसलिये अच्छे कार्य के लिये यदि दुःख भोगना भी पडे़, गाली सुनना या अत्याचार सहना पड़े तो उसे धैर्य के साथ सहते रहंे क्योंकि वह मनुष्यों की दृष्टि में तुच्छ है किन्तु ईश्वर की दृष्टि में पुण्य कर्म है।

आज माता कलीसिया येसु खीस्त को मनुष्यों का भला गडे़रिया मानती है, क्योंकि उन्होंने अपने क्रूस मरण द्वारा मनुष्यों को मृत्यु से बचाया और पापों को नष्ट किया तथा पुनरुत्थान द्वारा अनंत जीवन प्रदान किया। अतः हम उनके पुनरागमन की घोषणा करते रहें। आइए, हम पुनर्जीवित प्रभु खीस्त को अपने जीवन का स्रोत मानें।

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