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Sunday Homilies - May 25, 2014
पास्का का छठवाँ इतवार
By फादर आइज़क एक्का

आज के पहले पाठ में हमने सुना कि फिलिप समारिया जाकर मसीह का प्रचार करते हैं और अपदूतग्रस्त व्यक्तियों को चंगाई प्रदान करते हैं। सभी व्यक्ति जो विभिन्न प्रकार के रोगों से पीड़ित थे, मन में विश्वास लिए आते और चंगाई प्राप्त करते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि फिलिप समारिया के लोगों को प्रभु येसु के प्रेम की ओर आकर्षित करते हुए उन्हें बतलाते हैं कि मसीह मुक्तिदाता एवं तारणहार हैं। प्रभु येसु में विश्वास करने के कारण समारिया के लोगों में नये जीवन का संचार हुआ, वे अपने रोग और बीमारी से भले-चंगे हो गये। इससे पहले उन्होंने कभी मसीह के बारे में नहीं सुना और देखा था। उनके जीवन में प्रभु मसीह को स्वीकार करने के साथ ही परिवर्तन आ गया। संत पौलुस कहते हैं वचन तुम्हारे पास ही है, वह तुम्हारे मुख में और तुम्हारे हृदय में है। यह विश्वास का वह वचन है, जिसका हम प्रचार करते हैं। . . . हृदय से विश्वास करने पर मनुष्य धर्मी बनता है और मुख से स्वीकार करने पर उसे मुक्ति प्राप्त होती है’ (रोमियों 10:8-10)।

प्रभु येसु के वचन का प्रचार-प्रसार करना प्रत्येक खीस्त भक्त का कार्य है। इसे उन्हें अपने मन-वचन और कर्म से साक्ष्य देना है। प्रभु येसु अपने शिष्यों से कहते हैं, ‘पवित्र आत्मा तुम लोगों पर उतरेगा और तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करेगा और तुम लोग येरुसालेम, सारी यहूदिया और समारिया में तथा पृथ्वी के अंतिम छोर तक मेरे साक्षी होंगे (प्रेरित-चरित 1:8)। जहाँ ईश्वर के वचन का प्रचार किया जाता है, वहाँ आनन्द और शांति विद्यमान होती हैं। प्रभु येसु के पुनरुत्थान के बाद प्रेरित बखूबी से पुनर्जीवित प्रभु येसु के वचन का प्रचार करते है, फलस्वरूप अनेक लोग प्रभु को ग्रहण करके प्रेरितों की मण्डली में सम्मिलित होते थे।

सुसमाचार में प्रभु येसु अपने शिष्यों को पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि यदि तुम मुझे प्यार करोगे तो मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे। और कुछ ही क्षणों बाद वे अपनी स्वर्ग वापसी के बारे कहने लगते हैं। उनके इस प्रकार के वार्तालाप से शिष्य दुःखी हो जाते हैं। लेकिन प्रभु येसु उन्हें आश्वासन देते हुए कहते हैं कि वे उन्हें नहीं छोडें़गे, उन्हें एक सहायक प्रदान करेंगे, जो सदा उनके साथ रहेगा। पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा, जो उन्हें सत्य के बारे में सिखायेगा और सहायता प्रदान करेगा। आज के दूसरे पाठ में संत पेत्रुस का यह कहना है कि हम प्रभु येसु खीस्त पर श्रद्धा रखें और हमारी आशा के आधार के विषय में विनम्रता तथा आदर के साथ दूसरों को बताने के लिए तैयार रहें। यही खीस्तीय साक्ष्य है जिसके लिए पवित्र आत्मा ही हमारी मदद कर सकते हैं। शिष्यों के साथ पवित्र आत्मा के वास के लिए उन्हें कुछ शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता थी। यदि तुम मुझे प्यार करोगे, तो मेरी आज्ञाओ का पालन करो। हमें उनके आदर्शों और विधानों के अनुसार चलना पडे़गा। हमें एक दूसरे को अपने समान प्यार करना होगा, मन वचन और कर्म से उनकी आज्ञाओं को अपनाते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाना होगा, तभी हम उनके सच्चे शिष्य बन सकते हैं।

प्रभु येसु ने कहा, जिस प्रकार मैनें तुम लोगों को प्यार किया है, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो (योहन 15:12)। क्योंकि प्रभु येसु चाहते हैं कि हम एक दूसरे के साथ सहृदयता से रहे। ईश्वर को सारे हृदय और सारी शक्ति से तथा अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करना ही प्रभु येसु के सच्चे शिष्य की पहचान हैं। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज से अलग रहकर अपना बहुमुखी विकास नहीं कर सकता। इसलिए वह सभी से मिलजुल कर रहता है और मिलना-जुलना उसके जीवन का अभिन्न अंग है। इसी प्रकार जब हमारे घर में मेहमान का आगमन होता हैं, तब हम उनका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। उस समय हमारे मन में अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न होने लगती हैं। क्या हमारा रिश्तेदार-बंधु या भाई सही-सलामत घर पहंँुचेगा? क्या उसे रास्ते में किसी प्रकार की कठिनाई तो नहीं होगी? और हम उससे कहते हैं कि पहुँचने के बाद फोन करना या पत्र लिखना। इस प्रकार की भावनाओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अतः उसी प्रकार प्रभु येसु के शिष्य भी प्रभु येसु के विदाई भाषण को सुनकर विचलित हुए होंगे। लेकिन प्रभु येसु अपने शिष्यों को ढाढ़स बंधाते हुए कहते हैं कि मैं तुम लोगों को अनाथ छोड़ कर नहीं जाऊँगा, मैं तुम्हारे पास आऊँगा’ (योहन 14:18)। इससे प्रभु येसु अपने शिष्यों को बताना चाहते हैं कि उनका पिता के पास वापस जाना, कोई दुःखद घटना नहीं है। शिष्यों को प्रभु येसु से शिक्षा लेना था न कि उदास होना।

आइए हम आज इस यूखारिस्तीय बलिदान में भाग लेते वक्त आनन्दपूर्वक सुसमाचारीय जीवन को अपनाने के लिए प्रयत्न करें, क्योंकि पुनर्जीवित प्रभु येसु हमारे बीच हमेशा विद्यमान रहते हैं। उन्होंने हमें पवित्र आत्मा, अपना आत्मा प्रदान किया है। हम आज विशेष करके पवित्र आत्मा के वरदानों को समझने के लिए ईश्वर से वर माँगे, जिससे हम अपने जीवन में उनकी उपस्थिति को अनुभव कर सकें।

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