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Sunday Homilies - June 29, 2014
वर्ष का तेरहवाँ इतवार
By फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल

बाइबिल में अनेकों बार मनुष्य को ईश्वर के द्वारा पुरस्कृत किये जाने के संबंध हम पढ़ते हैं। संत मत्ती के सुसमाचार अध्याय 5 वाक्य 12 में हम पढ़ते हैं, ’’खुश हो और आनन्द मनाओ- स्वर्ग में तुम्हें महान पुरस्कार प्राप्त होगा’’। संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 6 वाक्य 35 में प्रभु यह समझाते हैं कि हमें शत्रुओं से प्रेम करना चाहिये क्योंकि यदि हम उन्हीं को प्यार करते हैं जो हमें प्यार करते हैं तो हम पुण्य नहीं कमा सकते हैं। इसलिये प्रभु कहते हैं, ’’अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान होगा. . .’’

दैनिक जीवन में हमें यह ज्ञात है कि पुरस्कार शब्द सुनने मात्र से ही हमें प्रोत्साहन मिलता है। लोगों की सराहना करने के लिये और उनको प्रोत्साहन देने के लिये हम उन्हें विभिन्न प्रकार के पुरस्कार देते हैं। जो पुरस्कार हम देते हैं उससे प्राप्तकर्ता को कुछ-न-कुछ लाभ होता ही है। छोटे बच्चों को हम खिलौने का पुरस्कार देते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों को हम पेन, टिफिन बाक्स आदि का पुरस्कार देते हैं। परीक्षाŸाीर्ण करने वालों को हम डिग्री से पुरस्कृत करते हैं। सैनिकों को वीरता का पुरस्कार दिया जाता है। महान व्यक्तियों को पदवी से नवाज़ा जाता है। लेकिन ये सब सांसारिक एवं भौतिक पुरस्कार हैं जो समय के साथ-साथ पुराने एवं अप्रासंगिक होते जाते हैं।

कुछसे पुरस्कार भी हैं जो मनोवैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। मान लीजिये, एक बच्चा किसी ऊँचे नैतिक मूल्य के आधार पर व्यवहार करता है तो उसके माता-पिता उसकी पीठ थपथपाकर उसे शबाशी देते हैं। यह एक ऐसा पुरस्कार है जिसे प्राप्त करने से प्राप्तकर्ता कोकेवल प्रेरणा मिलती है बल्कि उसका मनोबल भी बढ़ता है। इस प्रकार के पुरस्कारों की ज़रूरत हर मनुष्य अपनी जीवन यात्रा में किसी-न-किसी पड़ाव पर महसूस करता है। पुरस्कार प्राप्त करने की इच्छा लोगों को कठिन प्रयत्न करने के लिए प्रेरणा देती है। माता-पिता जो बच्चों की देखरेख करते हैं अपने बुढ़ापे में बच्चों से शायद यह आशा करते हैं कि उनके बच्चे उनकी सेवा एवं त्याग का पुरस्कार उनकी देखभाल करके चुकायें।

लेकिन सबसे उत्तम पुरस्कार वे हैं जो अनंत जीवन से संबंधित हैं। आज का सुसमाचार हमें इस सिलसिले में प्रेरणा देता है। प्रभु कहते हैं, ’’जो नबी का इसलिये स्वागत करता है कि वह नबी है, वह नबी का पुरस्कार पायेगा और जो धर्मी का इसलिये स्वागत करता है कि वह धर्मी है, वह धर्मी का पुरस्कार पायेगा’’। इस संदर्भ में यह तो साफ है कि पुरस्कार देने वाला प्रभु ईश्वर ही हैं। वे अपने भक्तों कोभी भी आध्यात्मिक पुरस्कारों से वंचित नहीं करते हैं। प्रभु कहते हैं, ’’जो इन छोटों में से किसी को एक प्याला ठण्डा पानी भी इसलिये पिलायेगा कि वह मेरा शिष्य है तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह अपने पुरस्कार ने वंचित नहीं रहेगा।’’

हमारे जीवन में हम ऐसे बहुत कार्य करते हैं जिसका प्रतिफल इस जीवन में प्राप्त करना शायद असंभव ही है। जब हम एक भूखे को खिलाते हैं तो हम यह नहीं सोचते हैं कि यह व्यक्ति मुझे इस काम के लिये कुछ पुरस्कार देगा। जब हम दुर्घटना में घायल व्यक्ति की सेवा-सुश्रूषा करते हैं तो हम यह नहीं सोचते हैं कि हमें उससे कुछ पुरस्कार मिलेगा। ऐसे अनेकों सेवा कार्य हैं जिनका पुरस्कार इस जीवन में प्राप्त करना मुमकिन नहीं है। लेकिन इस प्रकार के भले कार्य हम क्यों करते हैं? तुरन्त ही हमें यह जवाब मिलता है कि ये कार्य करने की प्रेरणा हमें अपने ईश्वरीय विश्वास से मिली हैं। हमारे अंतरतम में हम विश्वास रखते हैं कि ईश्वर जो सब कुछ देखते हैं हमारे भले कार्यों को देखकर हमें आध्यात्मिक पुरस्कार प्रदान करेंगे। आज का सुसमाचार हमारे इस विश्वास की पुष्टि करता है। विश्वास से प्रेरित होकर हम जो भी कार्य करते हैं उन सब कार्यों का प्रतिफल ईश्वर हमें देते ही हैं, यहाँ तक कि प्रभु ’’एक प्याला ठण्डा पानी’’ का जिक्र भी करते हैं।

आज के पहले पाठ में हम पढ़ते हैं कि नबी एलीशा शूनेम की धनी महिला के आभारी हैं जिसने उनका सेवा-सत्कार किया। जब-जब नबी एलीशा शूनेम से होकर जाते थे तो वे उस महिला के यहाँ भोजन करते थे। उस महिला ने अपने पति से नबी के लिये छत पर एक छोटा-सा कमरा भीनवाया। नबी इन सेवा कार्यों के प्रति बहुत कृतज्ञ थे और महिला को किसी न किसी पुरस्कार से सम्मानित करने की बात हमेशा सोचा करते थे। जब नबी को यह पता चलता है कि उस महिला का कोई पुत्र नहीं है और वह इस बात को लेकर बहुत चिंतित थी तो नबी ने ईश्वर से उसे पुत्र लाभ का पुरस्कार दिलवाया।

हमने भी अपने जीवन में कई बार यह जानते हुए भी कि हमें तुरंत कोपुरस्कार नहीं मिलने वाला है दूसरों की सेवा की। उन अवसरों पर शायद हमारी भी यही आशा थी कि ईश्वर जिनके नाम पर हम यह सब करते हैं हमें ज़रूर पुरस्कृत करेंगे। यह सच्चाई भी है। जब भी हम मिस्सा बलिदान में भाग लेते हैं, हम ऐसे कार्यों को प्रभु के समक्ष अर्पित करते हैं। साथ ही हम ईश्वर से और कृपायें माँगते हैं ताकि हम इस प्रकार के सेवा-कार्य को जारी रखें। ईश्वर का सर्वोत्तम पुरस्कार प्रभु येसु खीस्त में सारी मानव जाति को मिला है। लेकिन यह विडंबना ही है कि कई लोग जिनको यह पुरस्कार दिया जाता है इस सत्य को जानते तक नहीं हैं। यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम इस महान पुरस्कार को न केवल पहचानें बल्कि दूसरों को भी इसे पहचानने व अपनाने में मदद करें।

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