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Sunday Homilies - July 20, 2014
वर्ष का सोलहवाँ इतवार
By फादर डेविडसन वी. एम.

इब्राहीम के बारे में एक कथा प्रचलित है। एक वृद्ध ने, जिसे इब्राहीम ने बड़े आदर के साथ अपने तंबू में आमंत्रित किया था, उनके साथ एक ईश्वर की आराधना में भाग लेने से इंकार कर दिया। जब इब्राहीम को ज्ञात हुआ कि वह अग्नि का उपासक है तब उसने उस वृद्ध को तत्काल अपने तंबू से निकाल बाहर किया। उस रात ईश्वर ने इब्राहीम को दर्षन देकर कहा, ’’मैंने सत्तर साल तक इस व्यक्ति को सहा है, क्या तुम एक रात के लिये भी उसके साथ धैर्य नहीं रख सकते थे?’’

आज के सभी पाठ इसी सहनशीलता की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। इस संसार में धर्मी एवं अधर्मी दोनों हैं और हमेशा साथ-साथ बने रहेंगे। ऐसी स्थिति में सामंजस्य स्थापित करके एक खीस्तीय किस प्रकार अपना खीस्तीय जीवन जीयें, इस पर प्रभु जंगली बीज के दृष्टांत द्वारा रोशनी डालते हैं। इस धरा पर प्रभु के स्वर्गराज्य, कलीसिया में अधर्मी एवं बुरे उदाहरण देने वाले हमेशा रहेंगे, जो खीस्तीय जीवन जीने में खीस्त के अनुयायियों की मुष्किलें बढ़ायेंगे। जंगली बीज शुरू से ही गेहूँ के साथ था। यूदस इसका उदाहरण है जिसने प्रभु के साथ चाँदी के तीस सिक्कों के लिये विश्वासघात किया। जंगली पौधा गेहूँ का खात्मा नहीं करता, पर उसके पूर्ण परिपक्व होने में अड़चनें पैदा करता है। और यही खीस्तीयों के साथ भी होता है। कोई भी उससे उसके विश्वास को छीन नहीं सकता, पर उस विश्वास को जीने में अधर्मियों का गलत प्रभाव एवं बुरे उदाहरण मुष्किलें अवश्य पैदा करते हैं। अगर कोई इस गलत प्रभाव के सामने घुटने टेक देता है और अपने विश्वास में डगमगा जाता है तो दोष व्यक्ति विशेश का है, न कि अधर्मियों का।

ईश्वर धर्मी और अधर्म दोनों को स्वीकारते हैं। वे उनसे भेदभाव नहीं करते। वे धर्मी को उसकी धार्मिकता के कारण प्यार अवश्य करते हैं, पर अधर्मी को अधर्म के कारण त्यागते नहीं बल्कि उसके मन-परिवर्तन की बाट जोहते हैं। चूँकि मन-परिवर्तन की आवश्यकता धर्मियों को नहीं अधर्मियों को है, ईश्वर उन पर ज्यादा ध्यान देते हैं। इस संदर्भ में येसु कहते हैं, ’’निरोगों को नहीं रोगियों की वैद्य की ज़रूरत होती है’’। ईश्वर पाप से, अधर्म से घृणा करते हैं न कि पापी से, अधर्मी से। पर कई बार हम लोग इस तथ्य को भूल जाते हैं। हम लोग भी हमारी कथा के इब्राहीम के सामन पापियों से घृणा करते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि वे भी ईश्वर की संतान है। वे भी हमारे भाई-बहन हैं।

किसी के भी माथे पर यह लिखा नहीं होता कि वह धर्मी है या अधर्मी। किसी को पापी करार देने का अधिकार हमारा नहीं है। हो सकता है जिसे हम पापी, अधर्मी, दुराचारी समझते हैं वह हम से ज्याद धर्मी निकले। मनुष्य का हृदय रहस्यमय है। इसकी गहराई का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। समुद्र में गोता लगाकर उसके सतह से मोती निकाल लाना सहज है पर मनुष्य के हृदय की थाह पाना अत्यंत कठिन है। केवल ईश्वर ही मनुष्य के हृदय के रहस्य को जानते हैं। इसलिये अगर हम बाहरी आडंबर, रहन-सहन, व्यवहार आदि देखकर किसी पर उंगली उठाने का दुःसाहस करते हैं तब हम गलती करते हैं।

भी-कभी हम लोग जो इतवार-इतवार गिरजा जाते हैं, नियमित रूप से संस्कार आदि ग्रहण करते हैं, समय-समय पर चंदा देते हैं, छोटे-मोटे पुण्य के कार्य करते हैं जाने-अंजाने में अपने आप को दूसरों से अधिक धर्मी मानते हैं। अपने को धर्मी मानना कोई बुरी बात नहीं है, पर दूसरों को अपने से तुच्छ समझना धर्मी की मर्यादा नहीं। अगर यह धार्मिक काम सिर्फ दिखावे के लिये हम करते हैं तो हम उन अधर्मियों से भी अधिक दयनीय हैं।

इस संसार में अधर्मियों को सत्य का सहारा लेकर उन्नति करते देख सत्य के कारण कष्ट झेलते धर्मियों के मन में टीस उठना स्वभाविक है। पर इसके कारण हमें मायूस होने की ज़रूरत नहीं है। जिस प्रकार एक सच्चे योद्धा की पहचान रण भूमि में होती है उसी प्रकार सच्चे खीस्तीय की पहचान संकट की घड़ियों में होती है। असत्य से प्राप्त सफलता स्थायी नहीं होती है। ऐसी सफलता से कोई लाभ नहीं।

खीस्त इस धरा पर धर्मी एवं अधर्मी दोनों को पिता के पास ले जाने के लिये आये थे। वे अपने अनुयायियों से आशा करते हैं कि इस कार्य को जारी रखें। इसलिये हमारा फर्ज़ बनता है कि हम सिर्फ स्वयं स्वर्गराज्य में प्रवेश करने की बात न सोचें बल्कि अपने साथ दूसरों को भी ले चले, विशेषकर अपने कमज़ोर भाई-बहनों को। यह हम कैसे कर सकते हैं? इसका ज़िक्र आज का पहला पाठ हमसे करता है। ’’धर्मी को अपने भाइयों के प्रति सहृदय होना चाहिये।’’

किसान का जंगली पौधे को कटनी तक साथ-साथ बढ़ने देना अधर्मी के प्रति ईश्वर की असीम दया को दर्षाता है। अगर जंगली बीज, जो अपनी प्रकृति, अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, के साथ इतना धैर्य बरता जा सकता तो मनुष्य के साथ कितना ज्यादा धैर्य रखना ज़रूरी है जो अपना स्वाभाव, अपना मार्ग बदल सकता है। ईश्वर को निन्यानबे धर्मियांे की अपेक्षा एक भटके हुए अधर्मी की ज्यादा फ़िक्र है क्योंकि उसको उतनी ज्यादा आवश्यकता है। ईश्वर अंत तक अधर्मी को अपने बुरे मार्ग छोड़कर ईश्वर के मार्ग को अपनाने के लिये मौका और हर संभव सहायता प्रदान करते हैं।

यह निष्चित है कि कोई भी अधर्मी उसके द्वारा किये गये पापों के कारण स्वर्ग से वंचित नहीं किया जायेगा, पर इसलिये कि उसने समय रहते ईश्वर की दया पर भरोसा रखकर पश्चात्ताप नहीं किया। पेत्रुस एवं यूदस ने येसु के साथ विश्वासघात किया था। पर पेत्रुस ने ईश्वर की दया पर भरोसा रखकर अपनी गलती पर पश्चात्ताप किया और इसके फलस्वरूप वह कलीसिया का अगुआ बना और स्वर्गराज्य की कुंजी का धारक भी। इसके विपरीत यूदस ग्लानि के कारण ईश्वर की असीम दया पर भरोसा नहीं कर सका और अपना अंत कर लिया।

आज हम अपने आप में झांक कर देखें। क्या हम अपने आस-पड़ोस के अधर्मियों को सहन करते हैं कि नहीं? क्या हम उन्हें सात गुना सत्तर बार क्षमा करते हैं कि नहीं? क्या हम अपने जीवन से उनके सामने एक योग्य खीस्तीय का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं? क्या हम उनके मन-फिराव के लिये प्रार्थना करते हैं?

ईश्वर के सामने हम सब पापी हैं। हम सब को उनकी क्षमा एवं कृपा की आवश्यकता है। हमारे पापों के बावजूद वे हमसे घृणा नहीं पर हमारे साथ सहृदयता का बर्ताव करते हैं। क्यों न हम ईश्वर का अनुसरण करते हुए सहनशील बनें। आइए हम इस उद्देश्य के लिये विशेष प्रार्थना करें।
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