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Sunday Homilies - August 10, 2014
वर्ष का उन्नीसवाँ इतवार
By फादर रोनाल्ड वाँन

आज के पाठों में हम देखते हैं कि किस प्रकार ईश्वर अपने आप को मनुष्यों पर प्रकट करते हैं और ईश्वर के प्रकटीकरण के प्रति मनुष्य की क्या प्रतिक्रिया होती है। पहले पाठ में नबी एलियाह के ईश्वरीय अनुभव तथा सुसमाचार में प्रेरितों के, विशेषकर संत पेत्रुस के, येसु में ईश्वरीयता को पहचानने का विवरण है।

नबी एलियाह का जीवनकाल ईसा के जन्म से 850 वर्ष पूर्व का है। वे उस समय नबी का कार्य करते थे। इस दौरान इस्राएल पर आहाब का राज्य था जो अपनी पत्नी के बहकावे में आकर ईश्वर एवं उनकी संहिता के विरुद्ध काम कर रहा था तथा उसने बहुत से नबियों को मार डाला था। नबी एलियाह इससे डर एवं निराश हो गया था। अतः वह भाग कर होरेब पर्वत की गुफा में छिप गया था। वहाँ उसे ईश्वर की वाणी सुनाई पड़ी। पहले एक प्रचण्ड आँधी आई, इसके बाद भूकंप और फिर अग्नि। लेकिन ईश्वर इनमें से किसी में भी नहीं था। प्राचीन काल में मनुष्य ईश्वर को आँधी, बिजली, भूकंप, अग्नि आदि में खोजते थे। आज ईश्वर इनमें से किसी में भी नहीं थे। अंत में नबी एलियाह को मंद समीर की सरसराहट में ईश्वर का अनुभव होता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे ईश्वर एलियाह के डरे, सहमें एवं भयभीत हृदय को आराम एवं सांत्वना पहुँचाना चाहते हो।

जब एलियाह को ईश्वर का अनुभव होता है तब इसका उन पर क्या असर होता है? इससे एलियाह का ईश्वर में विश्वास पुनः जाग उठता है तथा वे एक बार फिर अपने नबी के कार्य को उत्साहपूर्वक करने को तत्पर दिखते हैं। ईश्वर एलियाह को अनेक काम सौंपते हैं यहाँ तक कि उसका उत्तराधिकारी नियुक्त करने का भी। इन सभी आदेशों को एलियाह मानते हैं और अपना आगे का जीवन जीते हैं। नबी एलियाह अपने इस विश्वास के कारण अपने सारे दायित्व पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हैं और उनकी गिनती इस्राएलियों के महानत्तम नबियों में की जाती है।

ईश्वर के अपने आप को प्रकट करने की लगभग ऐसी ही घटना की पुनारावृत्ति आज के सुसमाचार में होती है जब शिष्यगण येसु को पानी पर चलते हुए देखते हैं। नाव उस समय समुद्र के बीच में थी, लहरों से डगमगा रही थी, वायु प्रतिकूल थी, रात का समय था एवं शिष्यगण अकेले थे। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में जब वे येसु को समुद्र पर चलते हुए देखते हैं तो उन्हें पहचान नहीं पाते हैं तथा भय के मारे उन्हें भूत-प्रेत समझ बैठते हैं। लेकिन येसु उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए अपने को उन पर प्रकट करते हैं। इसके बाद पेत्रुस भी येसु की तरह ही पानी पर चलना चाहते हैं लेकिन थोड़ी देर चलने के बाद जब प्रचण्ड वायु चलती है तो वे घबरा जाते हैं एवं डूबने लगते हैं। येसु उन्हें उनके अल्पविश्वास के लिए धिक्कारते हैं।

इन दोनों पाठों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर हमारे जीवन मेंभी भी और कैसे भी आ सकते हैं। नबी एलियाह के पास मंद समीर के रूप में तथा शिष्यों के बीच में पानी के ऊपर चलते हुए। दोनों, एलियाह एवं शिष्यों ने आशा नहीं की थी कि वे ईश्वर का अनुभव इस तरह करेंगे। ईश्वर हमारी सोच, कल्पनाशक्ति, आशा आदि से परे हैं। वे हमारे जीवन में अनसोचे समय एवं अनचाहे तरीके से आ सकते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो सामने आती है वह यह है कि ईश्वर हमारे जीवन की तकलीफों को जानते एवं समझते हैं। नबी एलियाह जब अत्याचार एवं कुशासन से पीड़ित थे तब ईश्वर उनके जीवन में आकर उन्हें नवजीवन एवं नवीन उत्साह प्रदान करते हैं। इसी तरह जब शिष्यगण समुद्री तूफान में घिर गये थे तब येसु आकर तूफान को शांत करते हैं और शिष्यों को पार ले जाते हैं।

इस घटना सेमें यह भी मालूम होता है कि ईश्वर से मिलने का परिणाम मनुष्य का ईश्वर को पहचानना एवं उनके प्रति अपने आप को समर्पित करना है। ईश्वर की इसी महिमा का गुणगान हम आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस के शब्दों में पाते हैं जब वे कहते हैं, ’’. . . मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य हैं।. . .’’

आइए हम भी अपने जीवन में सतर्कता से ईश्वर के आने का इंतजार करें। उन्हें पहचानें एवं उनका अनुभव करें।
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