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Sunday Homilies - September 28, 2014
वर्ष का छब्बीसवाँ इतवार
By फादर जॉय थॉमस

आज की दुनिया में हम ऐसे अनेक लोगों से मिलते हैं, जो वादा करके निभाते नहीं हैं। हर चुनाव के समय सभी राष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवार लोगों से अलग-अलग वादे करते हैं, लेकिन चुनाव के बाद वे उन वादों को निभाते नहीं हैं। ऐसे लोग हमें हर क्षेत्र में मिलते हैं। ऐसे लोगों को दूसरों की कोई परवाह नहीं होती। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ऐसे लोगों के बारे में एक दृष्टांत सुनाते हैं। एक पिता के दो पुत्र थे। उसने पहले के पास जाकर कहा, ’बेटा! जाओ, आज दाखबारी में काम करो। उसने उत्तर दिया, ’मैं नहीं जाऊँगा’, किन्तु बाद में उसे पष्चाताप हुआ और वह दाखबारी में काम करने गया। जब पिता ने दूसरे पुत्र के पास जाकर कहा तो उसने उत्तर दिया, ’जी हाँ, पिताजी!किन्तु वह नहीं गया।

इस दृष्टान्त में दो प्रकार के लोगों को प्रस्तुत किया गया है। दोनों पुत्रों की मनोवृत्ति सही नहीं है। लेकिन जो पुत्र बाद में अपने पिता की आज्ञा का पालन करता है वह दूसरे पुत्र से बेहतर है। प्रभु येसु यहाँ यहूदियों और फ़रीसियों के बारे में कहते हैं, क्योंकि वे लोग अधर्म के रास्ते पर चलते थे। जिन नबियों ने उन्हें धार्मिकता का मार्ग दिखाया, उन पर उन्होंने विश्वास नहीं किया। ऐसे लोगों को ईश्वर द्वारा दण्ड दिया जायेगा। धर्मग्रंथ कहता है- ’’अधर्मियों को उनके विचारों के योग्य दण्ड दिया जायेगा क्योंकि उन्होंने धर्मी का तिरस्कार और प्रभु का परित्याग किया’’ (प्रज्ञा 3:10)

यहूदी लोग ईश्वरीय नियमों की व्याख्या अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये तोड़-मरोड़कर करते थे। लेकिन ईश्वर कहते हैं- ’’जो प्रज्ञा और अनुशासन को तुच्छ समझते हैं, वे अभागे हैं, उनकी आशा निराधार है, उनका परिश्रम व्यर्थ है और उनके कार्य निष्फल हैं (प्रज्ञा 3:11)। हम दूसरों की गलत बातों में न आकर ईश वचन पर भरोसा कर अपने जीवन को आगे बढ़ायें। हम हमेशा लोगों के सकारात्मक विचार ही सुनें।

एक बार मेंढ़कों का एक समूह जंगल से गुजर रहा था। रास्ता गहरी खाई और ऊँचे पहाड़ों से होकर जाता था। यकायक उस समूह में से दो मेंढ़क एक गहरे गड्ढे में गिर गये। इससे हाहाकार मच गया। झुण्ड के अन्य सदस्य गड्ढे में झांककर हरा का अंदाज़ा लगाने लगे। गड्ढा गहरा था तो हर कोई उन मेंढ़को से कहने लगा कि प्रयत्न करने से कोई फायदा नहीं। वे वहाँ से कभी बाहर नहीं आ सकते। दोनों मेंढ़कों ने अपने साथियों की बात को अनसुना कर ऊपर की ओर छलांग लगाना शुरू किया। गड्ढे में गिरे एक मेंढ़क ने उनकी बात सुनकर जोर से छलांग लगाई, लेकिन वह नीच गिरा और मर गया। अब सभी मेंढ़क जीवित बचे साथी से कहने लगे- ’’क्यों मरने से पहले अपनी फज़ीहत कर रहे हो, इससे बेहतर है कि शांति के साथ मौत को गले लगा लो। आखिर सभी को एक न एक दिन मरना ही है।’’ स्थिति बड़ी अजब थी, ऊपर से मेंढ़क उसे छलांग नहीं लगाने के लिए कह रहे थे और वह अधिक प्रयास कर रहा था। तभी ऐसा हुआ कि एक जोरदार छलांग में वह गड्ढे के मुँह तक आ गया और दूसरी छलांग में बाहर। सभी साथी बहुत खुश हुए। उनमें से एक मंेढ़क ने पूछ ही लिया, ’’जब हम तुम्हें इतनी जोर-जोर से नहीं कूदने के लिये कह रहे थे, तब भी तुम एक के बाद एक छलांग लगाते रहे’’। इस पर वह मेंढ़क बोला- ’’मैं ऊँचा सुनता हूँ। जब आप लोग मुझे नहीं कूदने के लिये कह रहे थे, तब मैं वह सुन नहीं पा रहा था। मुझे लग रहा था कि आप लोग मेरा उत्साहवर्धन कर रहे हैं और मैं अपने प्रयत्नों में जुटा रहा।’’

यदि हम सही मार्ग पर हैं तो हमें लोगों के शब्दों कोनसुना करना भी लाभदायक हो सकता है, क्योंकि जहाँ अच्छे बोल किसी को प्रेरणा दे सकते हैं, वहीं नकारात्मक बोल हमारे आत्मविश्वास को कमज़ोर भी कर सकते हैं। हम क्या सुनें और क्या न सुनें, इस बात को बहुत ही विवेकपूर्ण ढ़ग से सोचने समझने की ज़रूरत है।

कभी-कभी हम ईश्वर को ही दोषी मानने लगते हैं। लेकिन आज के पहले पाठ में नबी एज़ेकिएल कहते हैं- ’’प्रभु न्यायसंगत हैं, मनुष्य अपनी धार्मिकता त्याग कर अधर्म करने लगता है। नबी कहते हैं, ’’जो व्यक्ति अपना पापमय जीवन त्यागकर धर्मिकता और न्याय के मार्ग पर चलेगा वही अपने जीवन को सुरक्षित रख पाएगा’’। हमें अपने पापमय जीवन को त्यागकर धार्मिकता के मार्ग पर चलना चाहिए।

एक बार नरक में एक सभा हुई कि कैसे, लोगों को नरक का पात्र बनाया जा सकता है। उस सभा में एक ने कहा- मैं जाकर लोगों को यह बताऊँगा कि स्वर्ग नहीं है। लेकिन उस सभा के अध्यक्ष ने कहा कि कोई आपका विश्वास नहीं करेगा क्योंकि सब जानते हैं कि स्वर्ग है। तब दूसरे ने कहा- मैं जाकर लोगों को बताऊँगा कि नरक नहीं है, आप अपनी मर्जी से जीओ। तब फिर अध्यक्ष ने कहा, ’’कोई विश्वास नहीं करेगा। क्योंकि सब जानते हैं कि नरक भी है।’’ तीसरे ने कहा- मैं जाकर कहूँगा कि अपने जीवन को धार्मिकता से भरने के लिये अभी काफी समय है। इसलिये आप लोग अपनी मर्जी से जीओ। यह सुनकर अध्यक्ष ने कहा कि आपको बहुत अनुयायी मिलेंगे।

हम अपने बुरे विचारों और आदतों को छोड़ने के लिये तैयार नहीं होते हैं। कभी हम बदलने के लिये समय माँगते हैं तो कभी कोशिश ही नहीं करते हैं। लेकिन हमें अपनी बुरी आदतों और विचारों को छोड़कर धार्मिकता के मार्ग में आगे बढ़ना चाहिए। जब हम धार्मिकता के मार्ग में आगे बढ़ेंगे, तब ही समाज में एकता, प्यार और आपस में सहयोग बढ़ेगा। संत पौलुस फिलिप्पियों के नाम पत्र में कहते हैं, ’’आप लोग अपने मनोभावों को ईसा मसीह के मनोभावों के अनुसार बना लें’’। हम मसीह की विनम्रता का अनुसरण करें। मसीह इतने विनम्र थे कि ईश्वर होते हुए भी वे दीन बनकर हमारे बीच आए। अंत में उन्होंने हमें पाप से बचाने के लिये क्रूस पर मरना स्वीकार किया। ’’मानव पुत्र अपनी सेवा कराने नहीं बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिये प्राण देने आया है।’’

हम प्रभु येसु से प्रेरित होकर विनम्रता, सेवाभाव, क्षमा, प्यार और त्याग का रास्ता चुनकर खीस्त मार्ग पर चलने की कोशिश करें। हम अपने अंतःकरण की जाँच करके देखें, कि हम ईश्वर के कितने निकट हैं। जब हम खीस्त की राह पर चलते हैं, तब हम ईश्वर के निकट हो जाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि जो कुछ हमारे जीवन में होता है, सब हमारी भलाई के लिये ही होता है। ईश्वर ने इस संसार की रचना मनुष्य के लिये की है ताकि वह इस संसार की सभी वस्तुओं का सही उपयोग कर ईश्वर की प्राप्ति करे। संसार को आनंद का बाज़ार मानने वाले सुख का अनुभव करते हैं और इसे दुःख का काराग्रह समझने वालों को दुःख ही मिलता है। एक शीशमहल की तरह है यह संसार। एक गाँव में शीषे से बना एक महल था। उसकी दीवारों पर हर जगह सैकड़ों शीषे लगे हुए थे। एक कुत्ता किसी दिन वहाँ पहुँचा और उसने उस महल के भीतर घुसने का विचार किया। किसी तरह उसने अंदर झांका तो उसे सैकड़ों नाराज़ कुत्ते दिखाई दिए उन्हें देखकर वह गुस्से से भौंकने लगा। उसके भौंकना शुरू करते ही सैकड़ों कुत्ते उसकी ओर भौंकने दौडे़। थोड़ी ही देर में वह घबरा गया और थककर भाग निकला और मन ही मन बोला कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कई दिन बीत गए। गाँव में एक नया कुत्ता आया। घूमते-घूमते वह भी उस शीशमहल के पास पहुँचा। वह एक खुश मिज़ाज और जिंदादिल कुत्ता था। महल को देखकर उसे बड़ी उत्सुकता हुई और उसने महल देखने की सोची। दुम हिलाते हुए उसने आहिस्ते से दरवाज़ा खोलकर महल में झाँककर देखा। उसे वहाँ सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखाई दिये। कुत्ते का आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे वहाँ सैकड़ों कुत्ते दोस्ताना अंदाज में उससे मिलने की खुशी जताते हुए नज़र आए। जब वह महल के बाहर आया तो उसने उस महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहाँ के अनुभव को अपने जीवन का सबसे अच्छा अनुभव माना। संसार भी एक ऐसा ही शीशमहल है। इसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। ईश्वर ने इस संसार को ऐसा बनाया है ताकि हम इसकी सभी वस्तुओं का ईश्वर के हित के अनुसार उपयोग करके ईश्वरीय महिमा में आनन्द मनाएं। जो लोग इस संसार को आनन्द का बाज़ार मानते हैं, वे यहाँ से हर प्रकार के सुख व आनन्द का अनुभव लेकर जाते हैं।

इस मिस्सा बलिदान में भाग लेते वक्त, हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस संसार में जो कुछ भी हैं, उसे ईश्वर की कृपा मानकर, ईश्वर की स्तुति के लिये उपयोग करें। अपने अच्छे व्यवहार द्वारा ईश्वर के प्रेम को दूसरों तक पहुँचाने के लिए, अपने पापों का प्रायष्चित कर, विनम्रता, सेवाभाव, क्षमा, प्यार और त्याग की राह पर चलकर ईश्वरीय हित के अनुसार अपने जीवन को धन्य करने के लिये प्रार्थना करें।

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