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Sunday Homilies - October 05, 2014
वर्ष का सत्ताईसवाँ इतवार
By फादर लैंसी फर्नान्डिस

येसु द्वारा इस्राएल को ईश्वर की दाखबारी के रूप में चित्रित करना उस समय के लोगों के लिये कोई नई बात नहीं थी। इस चित्रण की अधिकांश बातें इसायाह के दृष्टान्तों जैसे ईश्वर की दाखबारी, चुनी प्रजा आदि से मेल खाती है।

हिंसक एवं दुष्ट असामियों की कहानी मुक्ति के इतिहास को दर्षाती है। ईश्वर जो दाखबारी के स्वामी हैं ने अपनी प्रजा को धार्मिक तथा राजनैतिक नेताओं की देखरेख एवं संरक्षण में छोड़ा था। परिणामस्वरूप यह इन नेताओं की जिम्मेदारी थी कि वे लोगों में ईश्वरीय ज्ञान, प्रेम एवं आज्ञाकारिता के फल उत्पन्न करें जिससे उनपर ईश्वर का प्रेम एवं संरक्षण सदैव बना रहें। समय-समय पर ईश्वर ने नबियों को भेजकर लोगों को उनके कर्त्तव्यों के प्रति आगाह एवं सचेत किया, लेकिन लोगों ने इन चेतावनियों की न सिर्फ अनदेखी की बल्कि इन नबियों को अस्वीकृत तथा प्रताड़ित किया यहाँ तक कि किसी-किसी को मार भी डाला। अंत में ईश्वर ने स्वयं अपने पुत्र को भेजा लेकिन लोगों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा और प्रताड़ित कर उन्हें मार डाला।

येसु का इस धरती पर यह मिशन था कि वे एक नयी प्रजा की स्थापना करें। यह नयी प्रजा पिता ईश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता में समर्पित होगी जिससे वह ईश्वरीय जीवन एवं प्रेम की परिपूर्णता का अनुभव करे एवं ईश्वर के राज्य का अनंत सुख पाये। हम भी अक्सर इन असामियों की तरह व्यवहार करते हैं जब हम अनुचित एवं अवैधानिक साधनों के माध्यम से स्वयं के मालिक एवं ईश्वर बनने की चेष्टा करते हैं। मानव के दिल में घमण्ड है जो उसे अपने जीवन का नियत्रंण अपने हाथ में लेने तथा ईश्वर की आज्ञाकारिता से अलग होकर खुशी एवं सुख पाने के लिये उकसाता एवं प्रेरित करता है। हम आंशिक एवं तात्कालिक सुख के लोभ में पड़कर अनंत जीवन के सुख एवं आनन्द को भूल जाते हैं जो आज्ञाकारिता एवं सच्चाई की माँग करता है। हम अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को नहीं सुनते हैं जो हमें न्याऔर सत्य का मार्ग दिखाती है। यहाँ तक कि जब हम ईश्वर के संदेश या संदेशवाहक के विरुद्ध विद्रोह भी करते हैं तो भी वे हमें नष्ट नहीं करते बल्कि हमें पुनः जीतने की कोशिश करते हैं। हम उनके लिये अनमोल हैं। लेकिन ईश्वर के प्रति हमारा क्या रवैया है? ईश्वर द्वारा प्रदŸा वरदानों और कृपाओं का हम कितना समुचित सदुपयोग करते हैं?

ईश्वर की यह इच्छा है कि जब हम प्रार्थना, धर्मग्रन्थ एवं मिस्सा बलिदान में उनके वचनों को सुनते हैं, तब हम उनकी प्रजा, उनके पुत्र की कलीसिया के सदस्य अपना जीवन येसु को समर्पित करें। हम केवल येसु के साथ संयुक्त होकर ही पवित्र आत्मा की आवाज़ को सुन और पहचान सकते हैं। जैसे ही हम ईश्वर की आवाज़ सुनेंगे और उनकी ओर मुड़ेंगे हमारी सारी चिन्तायें दूर हो जायेंगी और हमारा मन स्वर्गिक सच्चाई की ओर उठ जायेगा जिससे हम जो कुछ सच, आदरणीय, न्यायसंगत, निर्दोष, प्रीतिकर, मनोहर, उत्तम एवं प्रषंसनीय हैं, उनके बारे में मनन् कर सकेंगे।

में अपनी प्रार्थना में येसु में निहित ईश्वरीय प्रेम के लिये ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिये। हमें येसु से प्रार्थना करना चाहिये कि वे हमारे जीवन के स्वामी बने रहें जिससे हम उनमें और उनके साथ रहकर ईश्वर के प्रति वफादार बनें, उनकी शांति, महिमा और संरक्षण के सहभागी बनें तथा जिस फल की आशा ईश्वर हम से करते हैं उसे उत्पन्न सकें।
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