Questions & Answers
क्लीसियाइ इतिहास
’पाश्चात्य विच्छिन्न सम्प्रदाय’ किसे कहते हैं?
कई चुनौतियों के बावजूद’’ भी प्रभु के संरक्षण तथा पवित्र आत्मा के मार्गदर्षन में कलीसिया आगे बढ़ती रही। बारहवीं सदी के मध्य में फ्रांसीसी राजा फिलिप (Philip the Fair) ने कलीसिया से कर वसूल करना चाहा। इस पर पापा बोनिफस आठवें ने कलीसिया पर कर लगानेवालों को कलीसिया से निष्कासित करने की धमकी दी। इस का राजा फिलिप पर कोई असर नहीं पड़ा। संत पापा ने सन् 1302 में एक आदेषपत्र जारी कर फ्रांसीसी राष्ट्र के ऊपर भी पापा का अधिकार होने का दावा किया। इसके विरोध में सितंबर 1303 में राजा फिलिप ने पापा को कैदी बना दिया और कुछ ही दिनों में पापा का निधन हुआ। पापा बोनिफस आठवें के उत्तराधिकारी पापा बेनेड़िक्ट ग्यारहवें और पापा क्लेमेन्ट पाँचवें पर फ्रांसीसी शासकों का बडा प्रभाव था। फलस्वरूप सन् 1309 में पापा क्लेमेन्ट पाँचवें ने अपना निवास स्थान रोम से स्थानान्तरिक कर फ्रांसीसी नगर अविन्जोन में कर लिया। साधारणतः संत पापा रोम में रहते थे। ज्यादातर लोग इसे कलीसिया की परम्परा ही मानते थे क्योंकि रोम संत पेत्रुस का धर्मप्रान्त था और पेत्रुस और पौलुस रोम में ही शहीद हुए थे। इसलिए यह कलीसिया में गंभीर संकट का कारण बना। सन् 1376 तक संत पापा अविन्जोन में ही रहे। इतिहासकार इस अवधि को कलीसिया की ’’बेबीलोनिया की क़ैद’’ (Babylonian Captivity of the Church) कहते हैं। सन् 1376 में संत पापा गे्रगोरी नवें ने अपना आस्थान पुनः रोम में स्थापित किया। सन् 1378 में पापा गे्रगोरी नौंवें की मृत्यु पर रोम में नये पापा का चुनाव हुआ। इससे असंन्तुष्ट कुछ कार्डिनलों ने मिलकर अविन्जोन में दूसरे पापा का चुनाव किया। दोनों पापा और उनके अनुयायी वैधता का दावा करते थे। यह संकट तब और अधिक गहराता गया जब कुछ कार्डिनलों ने दोनों पापाओं को अवैध मानकर पीसा नगर में नये पापा का चुनाव किया। परन्तु किसी ने अपना स्थान नहीं छोड़ा। इस प्रकार कलीसिया में सबसे निन्दात्मक विच्छिन्न सम्प्रदाय (Schism) प्रकट हुआ और एक ही समय तीन पापा कार्य कर रहे थे - हर एक अपनी वैधता का दावा करते रहे। कलीसिया के सदस्य बड़ी उलझन में पड़ गये कि किसको वैध पापा मानें। सन् 1417 में पापा मार्टिन पाँचवें के चुनाव के साथ ही इस विच्छिन्न सम्प्रदाय का अन्त हुआ। यह ’’पाश्चात्य विच्छिन्न सम्प्रदाय’’ (Western Schism) के नाम से जाने जाता है। हम इसका अन्दाज़ा नहीं लगा सकते हैं कि इस लज्जाजनक घटनाक्रम का विश्वासियों पर कितना हानिकारक प्रभाव पड़ा होगा और इससे उनके विश्वास को कितना आघात पहुँचा होगा।
कलीसियाई इतिहास में ’’बेबीलोनिया की क़ैद’’ किसे कहते हैं?
पापा बोनिफस आठवें के उत्तराधिकारी पापा बेनेड़िक्ट ग्यारहवें और पापा क्लेमेन्ट पाँचवें पर फ्रांसीसी शासकों का बडा प्रभाव था। फलस्वरूप सन् 1309 में पापा क्लेमेन्ट पाँचवें ने अपना निवास स्थान रोम से स्थानान्तरिक कर फ्रांसीसी नगर अविन्जोन में कर लिया। साधारणतः संत पापा रोम में रहते थे। ज्यादातर लोग इसे कलीसिया की परम्परा ही मानते थे क्योंकि रोम संत पेत्रुस का धर्मप्रान्त था और पेत्रुस और पौलुस रोम में ही शहीद हुए थे। इसलिए यह कलीसिया में गंभीर संकट का कारण बना। सन् 1376 तक संत पापा अविन्जोन में ही रहे। इतिहासकार इस अवधि को कलीसिया की ’’बेबीलोनिया की क़ैद’’ (Babylonian Captivity of the Church) कहते हैं।
कलीसियाई इतिहास में त्रेन्त महासभा का क्या महत्व है?
प्रोटेस्टेन्ट आंदोलन के खिलाफ़ संत पापा पौलुस तृतीय ने प्रतिक्रियास्वरूप कलीसियाई धर्म सुधार के लिए सन् 1545 में इटली के त्रेन्त नगर में धर्माध्यक्षों की महासभा बुलाई। इस महसभा में लूथर की कलीसिया विरोधी शिक्षाओं का खण्डन किया गया। महासभा बुलाने में विलम्ब होने के कारण विभाजन ने जड पकड ली थी और मेल-मिलाप संभव नहीं था। महासभा ने कलीसिया के सात संस्कारों के प्रभु ख्रीस्त के द्वारा स्थापित होने की शिक्षा और विश्वास के साथ-साथ अच्छे कर्मों की ज़रूरत पर जोर दिया। त्रेन्त की महासभा ने कलीसिया में प्रचलित कई कुप्रथाओं तथा भ्रष्टाचार की निन्दा की और इन बुराईयों को दूर करने के लिए समुचित कार्रवाई की। इस प्रकार इस महासभा ने कलीसिया के पुनरुद्धार का काम आरंभ किया। महासभा के अन्त तक प्रोटेस्टेन्ट सुधारक आधे यूरोप को अपने प्रभाव में ला चुके थे। कई धर्मात्माओं तथा धर्मसमाजों ने इस प्रभाव से कलीसिया के सदस्यों को बचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कई लोगों ने प्रोटेस्टेन्ट शिक्षा तथा सिद्धान्तों को छोड़कर काथलिक कलीसिया में अपना विश्वास पुनः जताया।
कलीसियाई इतिहास में प्रथम वतिकान महासभा की क्या भूमिका रही?
सन् 1869 में संत पिता पीयुस नौंवें ने विश्वास और युक्ति के संम्बन्ध तथा संत पापा के अधिकार पर विचार-विमर्श करने के लिए वतिकान में धर्माध्यक्षों की एक महासभा बुलाई। इस महासभा ने यह सिखाया कि जब संत पापा अपने धर्मासन से, याने कलीसिया के मुख्य गडेरिये तथा संत पेत्रुस के उत्ताराधिकारी की भूमिका निभाते हुए सारी कलीसिया को विश्वास तथा नैतिकता से सम्बन्धित कुछ प्रामाणिक शिक्षा देते हैं, तो वह शिक्षा पवित्र आत्मा की सहायता से त्रुटिहीन और असुधार्य होती है। फ्रांस और प्रेशिया के बीच जो युद्ध शुरू हुआ उस के कारण महासभा की कार्यविधि को अचानक स्थागित करना पडा।
कलीसिया की शुरुआत कैसे हुई?
पुनरुत्थान के बाद चालीस दिन तक प्रभु येसु शिष्यों को दिखाई देते रहे और उनको ईष्वर के राज्य के विषय में शिक्षा देते रहे। (प्रेरित-चरित 1:1-3) उन्होने शिष्यों से कहा, ‘‘मुझे स्वर्ग मं और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। इसलिए तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो -मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ।‘‘ (मत्ती 28:18-20)। उन्होंने शिष्यों को यह भी आदेश दिया कि वे येरुसालेम न छोड़ें, बल्कि पवित्र आत्मा की प्रतीक्षा करें। प्रभु येसु शिष्यों के देखते-देखते स्वर्ग में आरोहित कर लिये गये। शिष्य येरुसालेम गये तथा ‘‘अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा अन्द्रेयस, फिलिप तथा थोमस, बरथोलोमी तथा मत्ती, अलफाई का पुत्र याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस। ये सब एक हृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।‘‘ (प्रेरित-चरित 1:13-14) ‘‘जब पेंतेकोस्त का दिन आया और सब शिष्य एक स्थान पर इकट्ठे थे, तो अचानक आँधी-जैसी आवाज आकाश से सुनाई पड़ी और सारा घर, जहाँ वे बैठे हुए थे, गूँज उठा। उन्हें एक प्रकार की आग दिखाई पड़ी, जो जीभों में विभाजित हो कर उन में हर एक के ऊपर आ कर ठहर गयी। वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त वरदान के अनुसार भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलने लगे।‘‘(प्रेरित-चरित 2:1-4) पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा के आगमन के साथ येरुसालेम में कलीसिया का औपचारिक उद्घाटन हुआ। अन्य शिष्यों के साथ खड़े होकर जब पेत्रुस ने येसु के पुनरुत्थान का साक्ष्य दिया तब उस से प्रभावित होकर उस दिन करीब तीन हजार लोगों ने मसीह में विष्वास किया और वे बपतिस्मा ग्रहण कर षिष्यों में सम्मिलित हो गये।(प्रेरित-चरित 2:41) उस समय से प्रभु येसु के शिष्य संसार के कोने-कोने में जाकर सुसमाचार सुनाने की आज्ञा के अनुसार दुनिया के विभिन्न देशों और समुदायों में रहने वाले भाइ-बहनों के बीच प्रभु में अपने विश्वास और अनुभवों को बाँटते हैं।
आदिम कलीसिया में ख्रीस्तीय विश्वासी किस प्रकार अपना जीवन बिताते थे?
आदिम कलीसिया में विश्वासियों का यह समुदाय एक हृदय और एक प्राण था (प्रेरित-चरित 4:32)। उनके पास जो कुछ था, उसमें सबों का साझा था। सबों की ज़रूरतों का बराबर ध्यान रखा जाता था (प्रेरित-चरित 4:34-35)। उनके बीच आपसी भाई-चारा था। वे दत्तचित्त होकर प्रेरितों की षिक्षा सुनते थे। वे सब मिलकर प्रतिदिन मन्दिर जाते तथा सामूहिक प्रार्थनाओं में नियमित रूप से षामिल हुआ करते थे। वे निजी घरों में प्रभु-भोज में सम्मिलित होकर निष्कपट हृदय से आनन्दपूर्वक एक साथ भोजन करते थे। (प्रेरित-चरित 2:42-47) प्रेरितों के प्रचार का मुख्य मुद्दा येसु का पुनरुत्थान था। वे चमत्कारों एवं चिन्हों से प्रभु का साक्ष्य देते थे (प्रेरित-चरित 5:12) और इसके फलस्वरूप विश्वासियों की संख्या में दिनों-दिन वृद्धि हो रही थी (प्रेरित-चरित 5:14, 6:7)।
कलीसिया में उपयाजकों की नियुक्ति कैसे शुरू हुई?
आदिम कलीसिया में विश्वासियों की बढ़ती संख्या के कारण रसद वितरण में अनियमता होने लगी और लोगों में असंतोष फैलने लगा। प्रेरितों ने इस समस्या से निपटने के लिए लोगो को उनके बीच से पवित्र आत्मा से परिपूर्ण सात बुद्धिमान तथा ईमानदार व्यतियों को चुनने का सुझाव दिया। लोगों ने स्तेफनुस, फिलिप, प्रोखोरूस, निकानोर, तिमोन, परमेनास और निकोलास को चुना। प्रेरितों ने स्वयं प्रार्थना एवं वचन की सेवा में लगे रहने का निर्णय लिया (प्रेरित-चरित 6:1-6)।
कलीसिया किन लोगों को कलीसियाई पितामह मानती है?
प्रभु येसु के बारह प्रेरितों की मृत्यु से लेकर सन् 749 तक का समय पूर्वी कलीसिया के लिए और सन् 636 तक का समय पाश्चात्य कलीसिया के लिए कलीसियाई पितामह-युग (Patristic Era) कहलाता हैं। कलीसिया में किसी भी व्यक्ति को पितामह की मानोपाधि देने के कुछ षर्तें थीं। 1. पुरातनता- वे ऐसे व्यक्ति हों जिनका जीवन-काल प्रेरितिक काल एव आठवीं सदी के बीच हों। 2. जीवन की पवित्रता- वे ऐसे व्यक्ति हों जिन्होंने पवित्र जीवन बिताया हो। 3. शास्त्र सम्मत्तता- वे ऐसे व्यक्ति हो, जो कलीसिया की प्रामाणिक शिक्षा के प्रति निष्ठावान तथा वफादार हों। 4. कलीसियाई मान्यता- वे ऐसे व्यक्ति हों, जिन्हें औपचारिक कलीसियाई मान्यता प्राप्त हो। इन तत्वों के आधार पर कलीसिया तेर्तुलियन, इंरनेयुस, हिप्पोलिटस, सिप्रियन आदि महान व्यक्तियों को कलीसियाई पितामह मानती है।