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लघु ख्रीस्तीय समुदाय
लघुख्रीस्तीय समुदाय क्या है?
कई बड़ी पल्लियों में लोगों का यह अनुभव रहा है कि विश्वासियों का एक समुदाय बनना मुश्किल है क्योंकि उनकी संख्या बड़ी है। जब पल्लिवासियों की संख्या हजारों में है तो उनके बीच सहभागिता, मेलमिलाप, सहकारिता तथा आत्मीयता की आशा हम कैसे कर सकते हैं? इसी कारण सहभागिता को दैनिक जीवन में संभव बनाने हेतु पल्लिवासियों को छोटे-छोटे समुदायों में जीवन बिताने की प्रेरणा देना ज़रूरी है। लघु ख्रीस्तीय समुदायों में ख्रीस्तीय विश्वासी पड़ोस में एकत्रित होते हैं, ईश वचन में जुड़े हुए रहते हैं, परस्पर सहयोग द्वारा मिलकर कार्य करते हैं तथा हर तरह से संपूर्ण नवीनीकरण का लक्ष्य रखते हैं। आदिम कलीसिया ने छोटे घरेलू गिरजाघरों का आदर्श अपनाया था। विश्वव्यापी कलीसिया तब तक सिद्धांत तक ही सीमित रहती है जब तक उसकी अभिव्यक्ति लघु ख्रीस्तीय समुदायों में न हो। लोग पड़ोस में रहने वाले ख्रीस्तीय विश्वासियों के समुदाय से ही विश्वव्यापी कलीसिया को पहचानते हैं। हमारे आस-पड़ोस क्षेत्र वह वास्तविक जीवन क्षेत्र है जहाँ हमारी जिंदगी बनती या बिगड़ती है। विश्वव्यापी कलीसिया की तरफ से अपना दायित्व पड़ोस में निभाना हरेक लघु ख्रीस्तीय समुदाय का कर्त्ताव्य है। पहले विश्वासियों का यह विचार था कि कलीसिया केवल फादर-सिस्टरों की है। आज लोग इस सच्चाई को पहचानने लगे हैं कि ’’कलीसिया हम हैं।’’ लोकधर्मी अपने ही तरीके से ख्रीस्त के राजकीय, याजकीय तथा नबीय सेवाकार्य के सहभागी बनते हैं। परिवार को घरेलू कलीसिया कहा जाता है। परिवार के सदस्यों के बीच का सम्बंध खून पर आधारित है। लेकिन लघु ख्रीस्तीय समुदाय के सदस्यों के आपसी सम्बंधों का आधार ईशवचन है और इसी कारण यह पारिवारिक सम्बधों से और अधिक घनिष्ठ होता है (देखिए लूकस 8:19-21)। लघु ख्रीस्तीय समुदाय में जब हम मिलकर कलीसिया के स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं तो हमें यह समझना भी ज़रूरी है कि हम विश्वव्यापी कलीसिया से अलग नहीं है। सार्वत्रिक कलीसिया से हटकर किसी भी लघु ख्रीस्तीय समुदाय का कोई अस्तित्व नहीं है। इसी कारण हर लघु ख्रीस्तीय समुदाय अपनी पल्ली तथा धर्मप्रांत से हमेशा जुड़ा रहता है तथा अन्य लघु ख्रीस्तीय समुदायों के साथ सहभागिता में जीवन बिताता है। इस सहभागी कलीसिया के साक्षात्कार के लिये भारत के हरेक ख्रीस्तीय विश्वासी को कलीसिया के सभी कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेना तथा दूसरे विश्वासियों के साथ मिलकर जीना एवं कार्य करना होगा।