Questions & Answers
उत्पीड़्न
उत्पीड़न के सन्दर्भ में ख्रीस्तीय भाइ-बहनों को किस प्रकार की प्रतिक्रिया अपनानी चाहिए?
कहा जाता है कि संत पापा पीयुस ग्यारहवें ने रोम के पुरोहितों से एक बार पूछा, ’’कलीसिया के कौन-कौन से अंग हैं?’’ किसी पुरोहित ने कलीसिया के परम्परागत चार अगों को दुहराया जिसे उसने अपने बचपन में ही धर्म शिक्षा की कक्षा में कंठस्थ कर लिया था, ’’एक, पवित्र, काथलिक और प्रेरितिक’’। पापा ने कहा, ’’एक और जोड़िए- उत्पीड़न। वास्तव में कलीसिया शुरूआत से ही उत्पीड़न का शिकार थी। प्रभु ने कहा भी था, ’’यदि उन्होंने मुझे सताया, तो वे तुम्हें भी सतायेंगे’’ (योहन 15:20)। उत्पीड़न का मुकाबला करते समय कलीसिया न हिंसात्मक प्रतिक्रिया अपना सकती हैं, और न ही निराशा में पड़ सकती है। कलीसिया का हमेशा यह अनुभव रहा है कि उत्पीड़न से कलीसिया बढ़ती है, न कि घटती है। हरेक विश्वासी को हमेशा प्रभु में विश्वास रखकर भलाई करते हुए आगे बढ़ना है। संत पेत्रुस कहते हैं, ’’आप बुराई के बदले बुराई न करें और गाली के बदले गाली नहीं, बल्कि आशीर्वाद दें। आप यही करने बुलाये गये हैं; जिससे आप विरासत के रूप में आशीर्वाद प्राप्त करें’’। (1 पेत्रुस 3:9)। वे आगे कहते हैं, ’’यदि आप को धार्मिकता के कारण दुःख सहना पड़ता है, तो आप धन्य हैं। आप उन लोगों से न तो डरें और न घबरायें। अपने हृदय में प्रभु मसीह पर श्रद्धा रखें। जो लोग आपकी आशा के आधार के विषय में आप से प्रश्न करते हैं, उन्हें विनम्रता तथा आदर के साथ उत्तर देने के लिए सदा तैयार रहें। अपना अन्तःकरण शुद्ध रखें। इस प्रकार जो लोग आप को बदनाम करते हैं और आपके भले मसीही आचरण की निन्दा करते हैं, उन्हें लज्जित होना पडे़गा। यदि ईश्वर की यही इच्छा है, तो बुराई करने की अपेक्षा भलाई करने के कारण दुःख भोगना कहीं अच्छा है’’ (1 पेत्रुस 4:12-19)।
साम्प्रदायिकता तथा जातिवाद के वातावरण में ख्रीस्तीय विश्वासियों की क्या चुनौती है?
हमारे देश में कई नेता राजनीति से प्रेरित होकर साम्प्रदायिकता तथा जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके फलस्वरूप लोगों में एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या तथा नफ़रत की भावना उत्पन्न हो रही है। धर्म और जाति के नाम पर लोग आपस में लड़ते-झगड़ते तथा बेदर्दी से एक-दूसरे का खून बहाते हैं। वे एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों को गिराने में गर्व महसूस करते हैं। इस प्रकार के वातावरण में ख्रीस्तीय विश्वासियों की चुनौती यह होती है कि वे खुद साम्प्रदायिकता तथा विभाजन की ताकतों से दूर रहें और दूसरों को भी सहानुभूति, मेल-मिलाप तथा सहिष्णुता का रास्ता अपनाने को सिखायें।