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बाइबिल
साऊल (संत पौलुस) का मन-परिवर्तन कैसे हुआ?
जब लोग धर्मसेवक स्तेफनुस पर पत्थर मार रहे थे तब गवाहों ने अपने कपड़े साऊल नामक एक नवयुवक के पैरों पर रख दिये। साऊल का जन्म किलिकिया के तरसुस नगर में हुआ था, किन्तु उनका पालन-पोषण येरुसालेम में हुआ। गमालिएल के चरणों में बैठकर उन्हें पूर्वजों की संहिता की कट्टर व्याख्या के अनुसार शिक्षा-दीक्षा मिली। वे ख्रीस्तीयों का विरोध कर उनके ऊपर घोर अत्याचार करते तथा करवाते थे। उन्होंने प्रधानयाजक के पास जाकर दमिश्क के सभागृहों के नाम पत्र माँगे, जिन में उन्हें अधिकार दिया गया कि यदि वे वहाँ ख्रीस्तीय विश्वासियों का पता लगायें, तो वे उन्हें- चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ- बाँध कर येरुसालेम ले आये। जब वे यात्रा करते-करते दमिश्क के पास पहुँचे, तो उन्हें प्रभु येसु के दर्शन हुआ। इस घटनाक्रम का विवरण हम प्रेरित-चरित 9 और 22 में पाते हैं। इस घटना का साऊल पर बहुत प्रभाव पड़ा। उनका मन परिवर्तन हुआ तथा वे ‘पौलुस‘ नाम से जाने जाना लगे। यही सन्त पौलुस के प्रेरितिक जीवन की शुरूआत थी।
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