Questions & Answers
सन्त पापा
क्या यह सच हैं कि कलीसिया एक ही समय तीन पापा रह चुके हैं?
जी हाँ, यह ’पाश्चात्य विच्छिन्न सम्प्रदाय’ के कारण हुआ था। (कृपया आप ’पाश्चात्य विच्छिन्न सम्प्रदाय’ से संबंधित प्रश्न का उत्तर देखिए।)
क्या, कलीसियाई शिक्षा के अनुसार संत पापा की शिक्षा त्रुटिहीन है?
काथलिक कलीसिया संत पापा की हर शिक्षा को त्रुटिहीन नहीं मानती है। लेकिन प्रथम वतिकान महासभा की आधिकारिक शिक्षा के अनुसार, जब संत पापा अपने धर्मासन से, याने कलीसिया के मुख्य गडेरिये तथा संत पेत्रुस के उत्ताराधिकारी की भूमिका निभाते हुए सारी कलीसिया को विश्वास तथा नैतिकता से सम्बन्धित कुछ प्रामाणिक शिक्षा देते हैं, तो वह शिक्षा पवित्र आत्मा की सहायता से त्रुटिहीन और असुधार्य होती है।
काथलिक कलीसिया में सन्त पापा की भूमिका क्या है?
बारह प्रेरितों के समुदाय में संत पेत्रुस प्रथम थे। सुसमाचार में बारह प्रेरितों की सूचियों में पेत्रुस का नाम हमेशा प्रथम आता है (देखिये मत्ती 10:2-4; मारकुस 3:16-19; लूकस 6:13-16)। वे कई बार प्रेरितों के नाम पर बोलते थे तथा उनकी अगुवाई करते थे। प्रभु येसु ने उनको चट्टान कहा (मत्ती 16:18) तथा उन्हें विशेष अधिकार प्रदान किया ( मत्ती 16:17-19; योहन 21:15-17))। आदिम कलीसिया में भी पेत्रुस का स्थान अद्वितीय रहा। सभी प्रेरित विश्वास तथा कलीसियाई बातों में पेत्रुस से परामर्श करते थे। पेत्रुस रोम के प्रथम धर्माध्यक्ष थे। उनके शहीद बनने के बाद उनके उŸाराधिकारी भी कलीसियाई नेताओं में प्रथम माने जाते थे। अन्य धर्माध्यक्ष विश्वास संबंधी बातों में उनसे चर्चा करते थे तथा उनके सुझावों का आदर करते थे। सन् 96 में पापा क्लेमेंट प्रथम ने कुरिन्थ की कलीसिया को पत्र लिखकर उनके कुछ आध्यात्मिक नेताओं को उनके पद से हटाने के संबंध में मार्गदर्शन दिया। लगभग सन् 107 में अंताखिया के इग्नासियुस ने अपनी शहादत के पूर्व रोम यात्रा के दौरान 6 कलीसियाई समुदायों को एक पत्र लिखा था, जिसमें रोम की कलीसिया को सर्वोच्च स्थान देते हुए उसे सर्वश्रेष्ठ कलीसिया बताया। इग्नासियुस ने रोमी कलीसिया को प्रेम में सर्वोच्च भी बताया। उस समय से लेकर वर्तमान तक काथलिक कलीसिया की यह अटूट परंपरा रही कि कलीसिया के अधिकारियों में रोम के धर्माध्यक्ष को गरिमामय तथा सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। संत पापा, प्रेरित पेत्रुस के उत्तराधिकारी, ’पोप’ के नाम से लोकप्रिय हैं। पूर्वी कलीसिया में ’पोप’ शब्द का इस्तेमाल किसी भी पुरोहित के लिये किया जाता था परन्तु पश्चिम की कलीसिया में प्रारंभ से ही इस शब्द का इस्तेमाल धर्माध्यक्षों तक ही सीमित रहा। चैथी सदी में यह शब्द सिर्फ संत पापा के लिये ही आरक्षित किया गया। कलीसिया में संत पेत्रुस से लेकर वर्तमान संत पापा बेनेडिक्ट सौहलवें तक 266 संत पापा रहे। प्रोटेस्टेन्ट आन्दोलन के समय आन्दोलनकारियों ने कलीसिया पर संत पापा के विश्वव्यापी अधिकार का विरोध किया। इस संबंध में त्रेन्त की महासभा (सन् 1545) ने पुनः संत पापा के इस विशेष अधिकार पर ज़ोर दिया। प्रथम वतिकान महासभा (सन् 1869-70) में इस प्रामाणिक शिक्षा की घोषणा हुई कि संत पापा, पेत्रुस के उत्तराधिकारी होने के नाते, विश्वव्यापी कलीसिया के परमाध्यक्ष हैं तथा उन्हें विश्वास एवं नीति संबंधी प्रामाणिक शिक्षा देते समय अमोघता (त्रुटिहीनता, Infallibility) प्राप्त है। जब संत पापा विधिवत् घोषणा करते हैं कि विश्वास एवं नीति संबंधी कोई सिद्धांत प्रेरितिक परम्परा से प्राप्त ईश्वरीय प्रकाशन की धरोहर है और समस्त कलीसिया को उस सिद्धांत को मानना अनिवार्य है तब संत पापा अचूक हैं। साथ ही जो सत्य इस प्रकार से घोषित किया जाता है वह भी अचूक है। काथलिक कलीसिया का यह विश्वास तथा शिक्षा है कि जो अधिकार येसु ने अपने प्रमुख शिष्य पेत्रुस को दिया वह केवल सम्मानार्थ या निर्देशात्मक नहीं था बल्कि वास्तवितक है। यह अधिकार संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी होने के कारण संत पापा को प्राप्त है। यह अधिकार वैधानिक, शैक्षणिक एवं पवित्रकारक है। संत पापा का अधिकार सारी विश्वव्यापी कलीसिया पर सर्वोच्च, सम्पूर्ण, सामान्य और प्रत्यक्ष है। द्वितीय वतिकान महासभा (सन् 1962-65) में धर्माध्यक्षीय धर्मपरिषद (College of Bishops) के अधिकार पर भी ज़ोर डाला गया। यह काथलिक कलीसिया की परंपरा रही है कि पोप नव-नियुक्त महाधर्माध्यक्ष को पैलियम (Pallium) प्रदान करते हैं। पोप के हाथों से पैलियम ग्रहण करने का अर्थ महाधर्माध्यक्ष की पोप एवं सार्वत्रिक काथलिक कलीसिया के साथ एकता की स्वीकृति है। लातीनी भाषा के पैलियम शब्द से तात्पर्य वह लबादा है जो सफेद ऊन से बुना गया है एवं कंधे के ऊपर ओढ़ा जाता है। इस लबादे पर 6 छोटे-छोटे काले रंग के क्रूस के चिह्न अंकित होते हैं। यह संत पापा द्वारा महाधर्माध्यक्षो को दिया जाता है जो उनके धर्मप्रांतों में उनके अधिकारों की निषानी होती है। इस कारण से महाधर्माध्यक्ष इस अधिकार के चिह्न, पैलियम को केवल उनके ही अधिकार क्षेत्र के धर्मप्रांत में पहन सकते हैं। यह पैलियम प्रत्येक महाधर्माध्यक्ष को संत पापा व्यक्तिगत रूप से प्रदान करते हैं जो महाधर्माध्यक्ष को रोम की कलीसिया के धर्माध्यक्ष के साथ एकता में बंध जाने की निषानी होता है।
पैलियम (Pallium) क्या है? समझाइए।
यह काथलिक कलीसिया की परंपरा रही है कि पोप नव-नियुक्त महाधर्माध्यक्ष को पैलियम (Pallium) प्रदान करते हैं। पोप के हाथों से पैलियम ग्रहण करने का अर्थ महाधर्माध्यक्ष की पोप एवं सार्वत्रिक काथलिक कलीसिया के साथ एकता की स्वीकृति है। लातीनी भाषा के पैलियम शब्द से तात्पर्य वह लबादा है जो सफेद ऊन से बुना गया है एवं कंधे के ऊपर ओढ़ा जाता है। इस लबादे पर 6 छोटे-छोटे काले रंग के क्रूस के चिह्न अंकित होते हैं। यह संत पापा द्वारा महाधर्माध्यक्षो को दिया जाता है जो उनके धर्मप्रांतों में उनके अधिकारों की निषानी होती है। इस कारण से महाधर्माध्यक्ष इस अधिकार के चिह्न, पैलियम को केवल उनके ही अधिकार क्षेत्र के धर्मप्रांत में पहन सकते हैं। यह पैलियम प्रत्येक महाधर्माध्यक्ष को संत पापा व्यक्तिगत रूप से प्रदान करते हैं जो महाधर्माध्यक्ष को रोम की कलीसिया के धर्माध्यक्ष के साथ एकता में बंध जाने की निषानी होता है।